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बहुत ख़ास होती है अजा एकादशी, इन मंत्रों के जाप से मिलती है मुक्ति


26 अगस्त 2019 यानि सो सुबह 07.03 भाद्रपद के इस माह की दश्मी तिथि खत्म होने के बाद एकादशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी जिसके उपलक्ष्य में अजा एकादशी मनाई जाएगी। वैसे तो साल में आने वाली हर एकादशी का अधिक महत्वपूर्ण होती है।

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26 अगस्त 2019 यानि सो सुबह 07.03 भाद्रपद के इस माह की दश्मी तिथि खत्म होने के बाद एकादशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी जिसके उपलक्ष्य में अजा एकादशी मनाई जाएगी। वैसे तो साल में आने वाली हर एकादशी का अधिक महत्वपूर्ण होती है। मगर भादो माह में पड़ने वाली अजा एकादशी का खासा महत्व है। इसका एक कारण है ये है कि ये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के ठीक बाद पड़ती है। मान्यताओं के अनुसार इसे कामिका व अन्नदा एकादशी भी कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक इस दिन भगवान विष्णु के 'उपेन्द्र' स्वरूप की पूजा अराधना की जाती है और रात्रि में जागरण किया जाता है। बता दें इस बार ये इस बार ये एकादशी 26 अगस्त यानि सोमवार को पड़ रही है।

एकादशी तिथि प्रारम्भ- 26 अगस्त सुबह 7.03 से
एकादशी तृतीया समाप्त- 27 अगस्त सुबह 05:10 को

मान्यता है कि इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की पूजा से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

ऐसे करें पूजा-
घर में पूजा के स्थान पर या पूर्व दिशा में किसी साफ जगह पर गौमूत्र छिड़ककर वहां गेहूं रखें। फिर उस पर तांबे का लोटा यानी कलश रखें।



लोटे को जल से भरें और उसपर अशोक के पत्ते या डंठल वाले पान रखें फिर उस पर नारियल रख दें। इस तरह कलश स्थापना करें।

कलश पर या उसके पास विष्णु भगवान की मूर्ति रखकर कलश और भगवान विष्णु की पूजा करें और दीपक लगाएं और अगले दिन तक कलश की स्थापना हटा लें।

फिर उस कलश का पानी पूरे घर में छिड़क दें और बचा हुआ पानी तुलसी में डाल दें।

एकादशी फल
अजा एकादशी पर जो कोई भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करता है। उसके पाप खत्म हो जाते हैं। व्रत और पूजा के प्रभाव से स्वर्गलोक की प्राप्‍ति होती है।

इस व्रत में एकादशी की कथा सुनने भर से ही अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। इस व्रत को करने से ही राजा हरिशचंद्र को अपना राज्य वापस मिल गया था और मृत पुत्र फिर से जीवित हो गया था।

अजा एकादशी व्रत करने से व्यक्ति को हज़ार गौदान करने के समान फल प्राप्त होते हैं।

इसके अलावा करें इन मंत्रों का जाप-
लक्ष्मी विनायक मंत्र-
दन्ताभये चक्र दरो दधानं,
कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया
लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।

ॐ अं वासुदेवाय नम:
ॐ आं संकर्षणाय नम:
ॐ अं प्रद्युम्नाय नम:
ॐ अ: अनिरुद्धाय नम:
ॐ नारायणाय नम:

ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।
यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्टं च लभ्यते।।

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