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Wow : शहीद की पत्नी 26 साल से झोपड़ी में रह रही थी, लोगों ने चंदा करके नया मकान बनवा दिया


मध्य प्रदेश का इंदौर. सुंदर सा शहर. इसी सुंदर शहर से एक बड़ी सुंदर सी खबर भी सामने आई है. नेक दिली की खबर. एक लाइन में पहले जान लें- यहां के बेटमा गांव में शहीद की पत्नी, जो झोपड़ी में रह रही थी, उसके लिए कुछ लोगों ने चंदा जमा करके नया घर बनाया और रक्षाबंधन के दिन उस औरत ने घर में प्रवेश किया.

साल 1992 की बात है. बेटमा गांव के मोहन सिंह, जो बीएसएफ जवान थे, वो शहीद हो गए. उस वक्त उनका बेटा 3 साल का था और पत्नी राजू बाई प्रेगनेंट थीं. परिवार गरीब था. झोपड़ी में रहता था. मोहन के शहीद होने के 25 साल बाद तक सरकार ने राजू बाई को किसी तरह की कोई मदद नहीं दी. उन्होंने जैसे-तैसे करके, किसी तरह से अपने दोनों बच्चों को पाल पोसकर बड़ा किया. वो उसी झोपड़ी में रह रही थीं.

पिछले साल शहीद समरसता टोली का एक मेंबर बेटमा गांव गया. ये टोली इंदौर के कुछ लोगों का ग्रुप है, जो शहीद परिवारों का ध्यान रखता है. गांव-गांव जाता है, और शहीदों के परिवारों से मिलता है. समाज से जात-पात के भेदभाव को खत्म करने का भी काम करता है.


लेफ्ट- राजू बाई की झोपड़ी. राइट- राजू बाई का नया घर.

तो हुआ ये कि पिछले साल इसी ग्रुप का एक व्यक्ति बेटमा गांव पहुंचा. वहां उसे ये टूटी-फूटी झोपड़ी दिखी. उसने अपने ग्रुप के बाकी लोगों से कॉन्टैक्ट किया. उन लोगों ने राजू बाई से बात की. उनकी कहानी जानी. पता चला कि सरकार मदद नहीं कर रही है. तो शहीद समरसता टोली ने खुद मदद का बीड़ा उठा लिया.
पिछले रक्षाबंधन में वादा किया था

इस टोली के लोगों ने पिछले रक्षाबंधन राजू बाई से राखी बंधवाई और नया-पक्का घर बनाकर देने का वादा किया. गांव-गांव जाकर चंदा इकट्ठा किया. ‘एक चेक एक दस्तखत’ अभियान चलाया. अभियान सफल रहा. टोली ने 11 लाख रुपए इकट्ठे कर लिए. दो भागों में बांटा. 10 लाख रुपए से पक्का मकान बनाया. बचे हुए एक लाख से शहीद मोहन की प्रतिमा बनाने के लिए रखे, ये प्रतिमा अभी बन रही है.

मकान बनाकर 15 अगस्त के दिन चाबी राजू बाई को सौंप दी. 15 अगस्त वाले दिन राजू ने नए घर में प्रवेश कर लिया. वो इस टोली के लोगों की हथेलियों पर चलकर अपने नए घर तक पहुंचीं. 26 साल बाद अब जाकर राजू पक्के मकान में रहेंगी.

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