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प्रेम में धोखा मिलने पर नर्मदा नदी ने ली थी ये प्रतिज्ञा, जानकर हैरान रह जायेंगे आप


प्यार या प्रेम एक एहसास है। जो दिमाग से नहीं दिल से होता है प्यार अनेक भावनाओं जिनमें अलग अलग विचारो का समावेश होता है!,प्रेम स्नेह से लेकर खुशी की ओर धीरे धीरे अग्रसर करता है। ये एक मज़बूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना जो सब भूलकर उसके साथ जाने को प्रेरित करती है। ये किसी की दया, भावना और स्नेह प्रस्तुत करने का तरीका भी माना जा सकता है। जिसके उदाहरण के लिए माता और पिता होते है खुद के प्रति, या किसी जानवर के प्रति, या किसी इन्सान के प्रति स्नेहपूर्वक कार्य करने या जताने को प्यार कहा जाता हैं।
हमारे देश में नदियों का कितना महत्व है, ये किसी को बताने की जरूरत नही है, नदियों को हम माता के समान पूजते हैं, सभी जानते हैं कि गंगा नदी पृथ्वी पर अवतरित हुई थी, लेकिन बहुत ही कम लोग जानते हैं कि नर्मदा नदी का पृथ्वी पर जन्म हुआ था, तो आज हम नर्मदा नदी के बारे में बहुत ही खास जानकारी देने वाले हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार नर्मदा नदी का जन्म राजा मैखल की पुत्री के रूप में हुआ था, नर्मदा के बड़ी होने पर राजा मैखल ने नर्मदा की शादी के लिए शर्त रखी कि जो राजकुमार गुलाब कावली का फूल लाकर राजा को देगा वही नर्मदा का पति बनेगा, इसके कुछ दिनों के बाद सोनभद्र नाम का राजकुमार गुलाब कावली का फूल लेकर आया और राजा मैखल ने उसका विवाह नर्मदा के साथ तय कर दिया।

राजकुमार बहुत ही सुंदर था, लेकिन नर्मदा और राजकुमार ने एक दूसरे को देखा नही था, पर नर्मदा उसे पति मानकर बहुत प्रेम करने लगी थी, नर्मदा राजकुमार सोनभद्र को देखना चाहती थी, इसलिए उन्होंने अपनी एक दासी जुहिला के हाथों राजकुमार को एक पत्र भिजवाया, लेकिन जुहिला ने पत्र ले जाने के बदले नर्मदा से उसके वस्त्र और आभूषण मांग लिए और नर्मदा ने उसे वो दे दिए।

जुहिला नर्मदा के कपड़े और आभूषण पहनकर पत्र लेकर सोनभद्र के पास गयी, लेकिन जुहिला ने राजकुमार को ये नही बताया कि वो एक दासी है, और राजकुमार उसे राजकुमारी समझकर उस पर मोहित हो गया, काफी समय गुजरने के बाद जब जुहिला वापस नही आई तो नर्मदा सोनभद्र से मिलने गयी, वहां पहुंचकर उन्होंने राजकुमार और जुहिला को प्रेम में खोये हुए देखा, तो वह क्रोधित हो उठी।

उसी समय नर्मदा विपरीत दिशा में चल पड़ी और कभी वापस न आने और सदैव कुंवारी रहने की प्रतिज्ञा ले ली, कहा जाता है कि नर्मदा की पीड़ा आज भी उसके कल कल बहते हुए जल में महसूस की जा सकती है, और अपनी प्रतिज्ञा के कारण नर्मदा नदी विपरीत दिशा में बहते हुए अरब सागर में मिलती हैं, जबकि भारत की अन्य नदियाँ बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं।

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