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देवताओं द्वारा दिए गए प्रमुख वरदान जिनसे राक्षसी शक्ति का अंत हुआ


हिन्दू वेद, पुराण और अन्य स्मृति ग्रंथों में देवताओं द्वारा आम मनुष्य, दानव, दैत्य या राक्षसों को वरदान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। कहीं-कहीं तो देवता खुद देवताओं को वरदान देते हैं। उनके द्वारा दिए गए वरदान का कुछ तो सदुपयोग करते हैं तो कुछ दुरुपयोग। कुछ ऐसे वरदान हैं जिनका अवसर आने पर दूसरों को लाभ मिलता है।

हिरण्यकश्यप को मिला था ये वरदान :कश्यप ऋषि के दो पुत्र थे। हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष। दोनों में हिरण्यकश्यप (हिरण्यकशिपु) ज्यादा भयंकर था। हिरण्याक्ष को मारने के लिए ‍भगवान विष्णु को वराह अवतार लेना पड़ा था। हिरण्यकश्यप को कोई मार नहीं सकता था, क्योंकि उसने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि ‘आपके बनाए किसी प्राणी, मनुष्‍य, पशु, देवता, दैत्‍य, नागादि किसी से मेरी मृत्‍यु न हो। मैं समस्‍त प्राणियों पर राज्‍य करूं। मुझे कोई न दिन में मार सके न रात में, न घर के अंदर मार सके न बाहर। यह भी कि कोई न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार मार सके। न भूमि पर न आकाश में, न पाताल में न स्वर्ग में।'

इस वरदान ने उसके भीतर अजर-अमर होने का भाव उत्पन्न हो गया था। इसके चलते उसने धरती पर अत्याचार शुरू कर दिया था। लोगों को वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव की पूजा-प्रार्थना छोड़कर खुद की पूजा करने का कहता था। जो ऐसा नहीं करते थे उन्हें वह मार देता था।

हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु को नृसिंह अवतार लेना पड़ा था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। विष्णु भक्ति के कारण हिरण्यकश्यप प्रहलाद से इतना नाराज था कि उसने प्रहलाद को मारने का आदेश दे दिया था ।

हिरण्यकश्यप को चिंति‍त देख उसकी बहन होलिका ने प्रहलाद को लेकर अग्नि में प्रवेश करने का प्रस्‍ताव रखा। होलिका को वर प्राप्‍त था कि वह स्‍वयं अग्नि में न जलेगी। पर जब होलिका प्रहलाद को गोद में ले चिता पर बैठी तो एक चमत्‍कार हुआ। होलिका जल गई और प्रहलाद बच गए।

इस घटना के बाद हिरण्‍यकश्यप ने प्रहलाद को एक खंभे से बांध दिया। फिर भरी सभा में प्रहलाद से पूछा, ‘किसके बलबूते पर तू मेरी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करता है?’

यह कहकर हिरण्यकश्यप ने खंभे में घूंसा मारा। तभी खंभा भयंकर आवाज करते हुए फट गया और उसमें से एक भयंकर डरावना रूप प्रकट हुआ जिसका सिर सिंह का और धड़ मनुष्‍य का था। पीली आंखें, बड़े-बड़े नाखून, विकराल चेहरा और तलवार-सी लपलपाती जीभ। यही ‘नृसिंह अवतार’ थे। उन्होंने तेजी से हिरण्‍यकश्यप को पकड़ लिया और संध्या की वेला में (न दिन में, न रात में), सभा की देहली पर (न बाहर, न भीतर), अपनी जांघों पर रखकर (न भूमि पर, न आकाश में), अपने नखों से (न अस्‍त्र से, न शास्‍त्र से) उसका कलेजा फाड़ डाला। हजारों सैनिक जो प्रहार करने आए, उन्‍हें भगवान नृसिंह ने हजारों भुजाओं और नखरूपी शस्‍त्रों से खदेड़कर मार डाला।

भस्मासुर : भस्मासुर एक महापापी असुर था। उसने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए भगवान शंकर की घोर तपस्या की और उनसे अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन भगवान शंकर ने कहा कि तुम कुछ और मांग लो तब भस्मासुर ने वरदान मांगा कि मैं जिसके भी सिर पर हाथ रखूं वह भस्म हो जाए। भगवान शंकर ने कहा- तथास्तु।
भस्मासुर ने इस वरदान के मिलते ही कहा, भगवन् क्यों न इस वरदान की शक्ति को परख लिया जाए। तब वह स्वयं शिवजी के सिर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा। शिवजी भी वहां से भागे और विष्णुजी की शरण में छुप गए।
तब विष्णुजी ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर भस्मासुर को आकर्षित किया। भस्मासुर शिव को भूलकर उस सुंदर स्त्री के मोहपाश में बंध गया। मोहिनी स्त्रीरूपी विष्णु ने भस्मासुर को खुद के साथ नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। भस्मासुर तुरंत ही मान गया।

नृत्य करते समय भस्मासुर मोहिनी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा। शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने जिसकी नकल की और भस्मासुर अपने ही प्राप्त वरदान से भस्म हो गया।

त्रिपुरासुर :
असुर बालि की कृपा प्राप्त ‍त्रिपुरासुर भयंकर असुर थे। महाभारत के कर्ण पर्व में त्रिपुरासुर के वध की कथा बड़े विस्तार से मिलती है। भगवान कार्तिकेय द्वारा तारकासुर का वध करने के बाद उसके तीनों पुत्रों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण कर लिया। तीनों पुत्र तपस्या करने के लिए जंगल में चले गए और हजारों वर्ष तक अत्यंत दुष्कर तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। तीनों ने ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्माजी ने उन्हें मना कर दिया और कहने लगे कि कोई ऐसी शर्त रख लो, जो अत्यंत कठिन हो। उस शर्त के पूरा होने पर ही तुम्हारी मृत्यु हो।

तीनों ने खूब विचार कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा- हे प्रभु! आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर दें और वे तीनों पुरियां जब अभिजित नक्षत्र में एक पंक्ति में खड़ी हों और कोई क्रोधजित अत्यंत शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमें मारना चाहे, तब हमारी मृत्यु हो। ब्रह्माजी ने कहा- तथास्तु!
शर्त के अनुसार उन्हें तीन पुरियां (नगर) प्रदान की गईं। तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया। इन तीनों असुरों को ही त्रिपुरासुर कहा जाता था। इन तीनों भाइयों ने इन पुरियों में रहते हुए सातों लोकों को आतंकित कर दिया। वे जहां भी जाते समस्त सत्पुरुषों को सताते रहते। यहां तक कि उन्होंने देवताओं को भी, उनके लोकों से बाहर निकाल दिया।

सभी देवताओं को तीनों से छुप-छुपकर रहना पड़ा। अंत में सभी को शिव की शरण में जाना पड़ा।
सभी देवताओं ने शिव को अपना-अपना आधा बल समर्पित कर दिया। अब उनके लिए रथ और धनुष- बाण की तैयारी होने लगी जिससे रणस्थल पर पहुंचकर तीनों असुरों का संहार किया जा सके। इस असंभव रथ का पुराणों में विस्तार से वर्णन मिलता है।

पृथ्वी को ही भगवान ने रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा पहिए बन गए, सृष्टा सारथी बने, विष्णु बाण, मेरू पर्वत धनुष और वासुकि बने उस धनुष की डोर। इस प्रकार असंभव रथ तैयार हुआ और संहार की सारी लीला रची गई।
उस अमोघ बाण में विष्णु, वायु, अग्नि और यम चारों ही समाहित थे। अभिजित नक्षत्र में उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते ही भगवान शंकर ने अपने बाण से पुरियों को जलाकर भस्म कर दिया और तब से ही भगवान शंकर त्रिपुरांतक बन गए।

महिषासुर :
पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर एक असुर था। महिषासुर के पिता रंभ, असुरों का राजा था जो एक बार जल में रहने वाले एक भैंस से प्रेम कर बैठा और इन्हीं के योग से महिषासुर का आगमन हुआ। इसी वज़ह से महिषासुर इच्छानुसार जब चाहे भैंस और जब चाहे मनुष्य का रूप धारण कर सकता था। संस्कृत में महिष का अर्थ भैंस होता है।

महिषासुर सृष्टिकर्ता ब्रह्म का महान भक्त था और ब्रह्मदेव ने उन्हें वरदान दिया था कि कोई भी देवता या दानव उसपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता।

महिषासुर बाद में स्वर्ग लोक के देवताओं को परेशान करने लगा और पृथ्वी पर भी उत्पात मचाने लगा। उसने स्वर्ग पर एक बार अचानक आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया तथा सभी देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया। देवगण परेशान होकर त्रिमूर्ति ब्रम्हा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। देवताओं ने फिर से मिलकर उसे फिर से परास्त करने के लिए युद्ध किया परंतु वे फिर हार गये।
कोई उपाय न मिलने पर देवताओं ने उसके विनाश के लिए दुर्गा का सृजन किया जिसे शक्ति और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। देवी दुर्गा ने महिषासुर पर आक्रमण कर उससे नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसी उपलक्ष्य में हिंदू भक्तगण दस दिनों का त्यौहार दुर्गा पूजा मनाते हैं और दसवें दिन को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। जो बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है।

शुंभ और निशुंभ :शुंभ और निशुंभ नामक दो बड़े ही भयानक दो दैत्य थे जिन्होंने कठोर तप करके भगवान ब्रह्मा से वरदान हासिल किया था। दोनों भाई यह मानते थे कि हमारा अंत कोई स्त्री कैसे कर सकती है? उसकी इतनी सामर्थ्य नहीं हो सकती, तो इसलिए उन्होंने यह वरदान मांगा कि कोई भी पुरुष, देवता, राक्षस, दानव, असुर उनका वध न कर पाए।

बस फिर क्या था। इन दोनों भाइयों के आतंक से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। इन तीनों के आतंक को खत्म करने के लिए ही अंत में मां दुर्गा का अवतार हुआ था।

रक्तबीज :रक्तबीज का नाम तो आपने सुना ही होगा। वह बड़ा ही भयानक असुर था। भूमि पर उसके रक्त की एक भी बूंद गिरती तो उस रक्त से उसी के समान एक और राक्षस पैदा हो जाता। इस तरह युद्ध में उसकी जब हजारों बूंदें गिरीं तो हजारों राक्षस पैदा होकर हाहाकार मचाने लगे। यह भयानक मंजर देखकर देवता भी घबराने लगे। सभी सोच में पड़ गए कि इसे कैसे मारा जाए?

यह रक्तबीज दरअसल अपने पूर्व जन्म में असुर सम्राट रंभ था जिसको इंद्र ने तपस्या करते वक्त धोखे से मार दिया था। रक्तबीज के रूप में उसने फिर से घोर तपस्या की और यह वरदान प्राप्त किया कि उसके शरीर की एक भी बूंद अगर धरती पर गिरती है तो उससे एक और रक्तबीज उत्पन्न होगा।

अंत में महादेव के कहने पर माता काली ने रक्तबीज का वध किया था। शक्ति की अवतार मां काली ने रक्तबीज का सिर काटकर उसके रक्त का पान किया ताकि उसके शरीर की एक भी बूंद धरती का स्पर्श न कर सके।
महिषी : महिषासुर के वध के बाद उसकी बहन महिषी ने प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। उसके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी को प्रकट होना ही पड़ा। उसने ब्रह्माजी से वरदान मांगा कि उसका शिव और विष्णु से संयुक्त रूप से उत्पन्न संतान ही उसका वध कर सकती और कोई नहीं।
महिषी का अंत करने के लिए बाद में विष्णु के स्त्री अवतार मोहिनी और शिव के संसर्ग से उत्पन्न हुए अयप्पा द्वारा महिषी का अंत हुआ था।

राजा बली :
सतयुग में असुरों के एक राजा बली हुए, जो महाशक्तिशाली और परम दानवीर थे। असुर वंश में जन्म लेने के बावजूद ये भगवान विष्णु के भक्त थे। इन्होंने अपने बल से इंद्रलोक सहित संपूर्ण पृथ्वी पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु वामन का रूप धारण कर प्रकट हुए और बली से तीन पग भूमि दान में मांगी। दो पग में भगवान ने पृथ्वी व देवलोक को नाप लिया। तीसरा पग रखने के लिए जब कुछ नहीं बचा तब बली ने अपना सिर आगे कर दिया।

भगवान राजा बली की उदारता से प्रसन्न हुए और चिरंजीवी होने का वरदान दिया। भगवान विष्णु ने कहा कि चातुर्मास के दौरान वे पाताल लोक में निवास करें और वे पाताल लोक की रक्षा करेंगे।

कुबेर एक दिन कुबेर अपने पिता ऋषि विश्वेश्रवा से मिलने आश्रम पहुंचे तब कैकसी ने कुबेर के वैभव को देखकर अपने पुत्रों रावण, कुंभकर्ण और विभीषण से कहा कि तुम्हें भी अपने भाई के समान वैभवशाली बनना चाहिए। इसके लिए तुम भगवान ब्रह्मा की तपस्या करो। माता की आज्ञा मान तीनों पुत्र भगवान ब्रह्मा के तप के लिए निकल गए।

विभीषण पहले से ही धर्मात्मा थे, उन्होंने 5 हजार वर्ष एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप करके देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद 5 हजार वर्ष अपना मस्तक और हाथ ऊपर रखकर तप किया जिससे भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए। विभीषण ने भगवान से असीम भक्ति का वर मांग लिया। विभीषण श्रीराम के भक्त बने और आज भी वे अजर-अमर हैं।

कुंभकर्ण कुंभकर्ण ने इंद्रपद की अभिलाषा से अपनी इंद्रियों को वश में रखकर 10 हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसके कठोर तप से भयभीत होकर इंद्रादि देवताओं ने देवी सरस्वती से प्रार्थना कि कुंभकर्ण के वर मांगते समय आप उनकी जिह्वा पर विराजमान होकर देवताओं का साथ देना। तब वर मांगते समय देवी सरस्वती कुंभकर्ण की जिह्वा पर विराजमान हो गईं और कुंभकर्ण ने इंद्रासन की जगह निंद्रासन मांग लिया।

रावण रावण ने अपने भाइयों से भी अधिक कठोर तप किया। ऋषि विश्वेश्रवा ने रावण को धर्म और पांडित्य की शिक्षा दी। वो प्रत्येक 11वें वर्ष में अपना एक शीश भगवान के चरणों में समर्पित कर देता। इस तरह उसने भी 10 हजार साल में अपने दसों शीश भगवान को समर्पित कर दिए। उसके तप से प्रसन्न हो भगवान ने उसे वर मांगने को कहा।

तब रावण ने कहा ‍कि देव, दानव, दैत्य, राक्षस, गंधर्व, किन्नर, यक्ष आदि सभी दिव्य शक्तियां उसका वध न कर सके। रावण मनुष्य और जानवरों को कीड़ों की भांति तुच्छ समझता था इसलिए वरदान में उसने इनको छोड़ दिया। यही कारण था कि भगवान विष्णु को उसके वध के लिए मनुष्य अवतार में आना पड़ा। रावण ने अपनी शक्ति के बल पर शनि और यमराज को भी हरा दिया था।

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