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कोरोना की जिस दवाई को भारत ने दी मंजूरी, उसे मिली बड़ी कामयाबी


कोरोना वायरस के इलाज में इस्तेमाल की जा रही Gilead Sciences की एंटीवायरल दवा रेमडेसिवीर का बंदरों पर अच्छा असर देखने को मिला है. एक नई स्टडी के मुताबिक, ये दवा कोरोना वायरस से संक्रमित बंदरों में फेफड़ों की बीमारी को रोकती है. ये स्टडी मंगलवार को जर्नल नेचर में प्रकाशित हुई है.

प्रमाणिक मैगजीन में छपने से पहले इस स्टडी के निष्कर्षों पर अप्रैल के महीने में यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) द्वारा एक रिपोर्ट जारी की जा चुकी है. ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने 1 जून को रेमडेसिवीर के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी थी. गंभीर रूप से बीमार कोरोना के मरीजों को अब डॉक्टरों की तरफ से ये दवा दी जा रही है.

स्टडी के अनुसार, जिन बंदरों को रेमडेसिवीर दवा दी गई उनमें श्वसन रोग के कोई लक्षण नहीं दिखे और इस दवा ने इनके फेफड़ों को हुए नुकसान को भी कम किया. स्टडी के लेखकों ने कहा कि रेमडेसिवीर से इलाज किए जा रहे बंदरों के फेफड़ों में वायरल लोड या वायरस की मात्रा भी कम पाई गई.

लेखकों ने सुझाव दिया कि COVID-19 के मरीजों में निमोनिया को रोकने के लिए रेमडेसिवीर दवा को जल्द से जल्द दिए जाने पर विचार किया जाना चाहिए.

रेमडेसिवीर कोरोना वायरस की पहली ऐसी दवा है जो मानव परीक्षण में पूरी तरह से प्रभावी रही है. इस दवा पर की जा रही अन्य क्लिनिकल स्टडीज पर भी बारीकी से नजर रखी जा रही है.

रेमडेसिवीर को पिछले महीने जापान में वेकलरी (Veklury) नाम के ब्रांड के तहत मंजूरी दी गई थी. अमेरिका, भारत और दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस के गंभीर रूप से बीमार मरीजों को ये दवा इमरजेंसी इस्तेमाल में दी जा रही है. कुछ यूरोपीय देश भी इस दवा का उपयोग कर रहे हैं.

अप्रैल के अंत में जारी एक अमेरिकी क्लिनिकल परीक्षण के अनुसार, प्लेसिबो लेने वाले मरीजों की तुलना में रेमडेसिवीर लेने वाले मरीजों के अस्पताल में भर्ती मामलों में 31 फीसदी की कमी आई.

गिलियड ने पिछले सप्ताह रेमडेसिविर के अपने परीक्षण के डेटा की सूचना दी थी, जिसमें बताया गया था कि कोरोना वायरस के हल्के लक्षण वाले मरीजों को इस दवा का पांच दिनों का कोर्स देना असरदार रहा था.

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