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कारगिल युद्ध का पहला शहीद पहला वेतन भी नहीं ले पाया था, परिवार आज भी न्याय के इंतजार में


कारगिल युद्ध का जिक्र आते ही भारत के एक ऐसे लाल की कुर्बानी याद आती है, जिन्होंने पहली शहादत पाई थी। पालमपुर निवासी बलिदानी कैप्टन सौरभ कालिया और उनके पांच साथियों (नरेश सिंह, भीखा राम, बनवारी लाल, मूला राम और अर्जुन राम) की शहादत ने देश को पाकिस्तान के गलत इरादों के प्रति सचेत किया था। लद्दाख के बटालिक सेक्टर की बजरंग पोस्ट पर 22 वर्षीय सौरभ कालिया को बतौर कैप्टन तैनात हुए मात्र महीना ही हुआ था। उन्हें पहला वेतन भी नहीं मिला था।

भारतीय सेना की 4 जाट रेजिमेंट के महानायक कैप्टन सौरभ कालिया ने ही सबसे पहले कारगिल में पाक के नापाक इरादों की जानकारी भारतीय सेना को दी थी। 5 मई, 1999 की रात पांच साथियों के साथ बजरंग पोस्ट में पेट्रोलिंग करते हुए सौरभ कालिया को पाकिस्तानी घुसपैठियों की सूचना मिली थी। कै. कालिया ने साथियों के साथ कूच किया तो घात लगाकर बैठे घुसपैठियों ने पांचों को घायल अवस्था में पकड़ लिया था। फिर बंधक बनाकर 22 दिन तक यातनाएं दी थीं और तीन हफ्ते बाद उनकी पार्थिव देह क्षतविक्षत हालत में भारतीय सेना को सौंपी थी।

स्वजनों को मलाल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नहीं पहुंचाया मामला स्वजनों को लाडले की पार्थिव देह 9 जून, 1999 को क्षतविक्षत हालत में सौंपी गई थी। तबसे इस महान बलिदानी के पिता अपने स्तर पर न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध के 21 वर्ष बीतने के बाद भी स्वजनों को लाडले पर किए अत्याचारों के खिलाफ न्याय नहीं मिल पाया है। पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया को मलाल है कि केंद्र सरकार ने मामले को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक नहीं पहुंचाया है। बकौल डॉ. कालिया, कारगिल जाने से पहले सौरभ ने मां से शीघ्र घर लौटने का वादा किया था। साथ ही एक चेक सौंपकर जरूरत पर पैसे निकालने की बात कही थी। चेक आज भी घर में यादगार के रूप में रखा है।

खाना बनाने में माहिर थे सौरभ सौरभ के सहपाठी तथा कर्नल विकास शर्मा बताते हैं कि उन्होंने चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। स्नातक की डिग्री हासिल करने के दौरान उनमें अचानक सेना में भर्ती होने का जज्बा पैदा हुआ। कर्नल विकास बताते हैं कि दोनों ने ही एक साथ एप्लाई किया व साथ ही संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा में भाग लिया। बकौल विकास, उन्होंने किन्हीं परिस्थितियों के कारण एक साल बाद प्रशिक्षण किया लेकिन सौरभ ने तुरंत भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर 12 दिसंबर, 1998 में स्थायी कमीशन हासिल कर लिया था। वह बताते हैं कि सौरभ को खाना बनाने का शौक था। जब भी समय मिलता था तो सौरभ सभी के लिए स्वादिष्ट खाना बनाते थे।

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