Breaking News

कभी कारगिल युद्ध का सैनिक हुआ करता था और आज मजबूर है जूस की दुकान चलाने को जानिए क्यों मजबूर है


कारगिल युद्ध, जिसे ऑपरेशन विजय के नाम से भी जाना जाता है, भारत और पाकिस्तान के बीच मई और जुलाई 1999 के बीच कश्मीर के करगिल जिले में हुए सशस्त्र संघर्ष का नाम है।26 जुलाई को देशभर ने 19वां कारगिल विजय दिवस मनाया. युद्ध में शहीद हुए सिपाहियों की क़ुर्बानी याद की गई.कैप्टन विक्रम बत्रा का वो ख़त भी एक दफ़ा फिर हर तरफ़ शेयर किया गया.
लेकिन उस दिन भी एक कारगिल युद्ध का सिपाही, सबकी नज़रों से दूर अपने जूस की दुकान में लोगों के झूठे ग्लास चमकाने में व्यस्त था.

हम बात कर रहे हैं लांस नायक सतवीर सिंह की. नवभारत टाइम्स के मुताबिक, मुखमेलपुर गांव के रहने वाले सतवीर, दिल्ली से कारगिल युद्ध में लड़ने वाले इकलौते जवान हैं.

कारगिल युद्ध के 19 साल बाद भी, दुश्मन की एक गोली अब भी उनके पैर में है, जिस कारण वे चल-फिर नहीं सकते और बैसाखी का सहारा लेते हैं.

सीमा पर दुश्मनों से लड़ाई जीतने वाले वीर सतवीर को अपने ही देश ने हरा दिया. यह योद्धा करगिल की लड़ाई जीते, मगर हक के लिए सिस्टम से लड़ते हुए हार गए।

सतवीर बताते हैं, 'वह 13 जून 1999 की सुबह थी। करगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर थे। तभी घात लगाए पाकिस्तानी सैनिकों की टुकड़ी से आमना-सामना हो गया। 15 मीटर की दूरी पर थे पाकिस्तानी सैनिक।' 9 सैनिकों की टुकड़ी की अगुवाई सतवीर ही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका। बर्फ में 6 सेकंड बाद ग्रेनेड फट गया। जैसे ही फटा पाकिस्तान के 7 सैनिक मारे गए। उन्होंने बताया, 'हमें कवरिंग फायर मिल रहा था लेकिन 7 जवान हमारे भी शहीद हुए थे। उसी दरम्यान कई गोलियां लगीं। उनमें एक, पैर की एड़ी में आज भी फंसी हुई है। 17 घंटे वहीं पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। सारा खून बह चुका था। 3 बार हेलीकॉप्टर भी हमें लेने आया। लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग की वजह से नहीं उतर पाया। हमारे सैनिक ही हमें ले गए। एयरबस से श्रीनगर लाए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट कर दिया।'

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कारगिल युद्ध में 527 जवान शहीद हुए और 1300 से ज़्यादा घायल हुए. घायलों में सतवीर सिंह का भी नाम था. युद्ध में घायल हुए अफ़सरों, सैनिकों की विधवाओं और घायल अफ़सरों और सैनिकों को तत्कालीन रूप से सरकार की ओर से पेट्रोल पंप और खेती के लिए ज़मीन देने की घोषणा भी की गई थी.
1 साल से ज़्यादा समय तक दिल्ली में सेना के बेस अस्पतला में मेरा इलाज चला. पेट्रोल पंप मिलने की प्रक्रिया भी पूरी हुई, पर मिला नहीं. 5 बीघा ज़मीन मिली, जिस पर मैंने फलों का बाग लगाया. 3 साल पहले मुझसे वो भी छीन लिया गया. पैसों के अभाव में 2 बेटों की पढ़ाई भी छूट गई. अब पेंशन और इस जूस की दुकान से मैं अपने परिवार का पोषण करता हूं.

वह कहते हैं, '13 साल 11 महीने नौकरी की। मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट करार दिया। दिल्ली का अकेला सिपाही था। सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। सरकार ने जमीन व उस पर पेट्रोल पंप देने का वादा किया। उसी दरम्यान एक बड़ी पार्टी के नेता की तरफ से संपर्क किया गया। ऑफर दिया कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने इनकार किया तो सब कुछ छीन लिया गया। 19 साल से फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में घूम रही हैं। आज तक कोई नहीं मिला। कोई मदद नहीं मिली। सम्मान नहीं मिला। डिफेंस ने सम्मान बरकार रखा।'
पिछले 19 सालों से सतवीर पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों के दफ़्तर के चक्कर लगा रहे हैं. आज तक डिफ़ेंस के अलावा किसी ने उनको सम्मानित नहीं किया.
सरकारी आंकड़ों में करीब 527 देश के जवान शहीद हुए और करीब 1,300 से ज्यादा योद्धा घायल हुए थे। भारत की विजय के साथ 26 जुलाई को यह युद्ध समाप्त हुआ। करगिल के उन घायल योद्धाओं में लांस नायक सतवीर सिंह का भी नाम था। उस युद्ध में शहीद हुए अफसरों, सैनिकों की विधवाओं, घायल हुए अफसरों और सैनिकों के लिए तत्कालीन सरकार में पेट्रोल पंप और खेती की जमीन मुहैया करवाने की घोषणा की थी।

लांस नायक सतबीर सिंह के पैर में 2 गोलियां लगी थीं। एक तो पांव से लगकर एड़ी से निकल गई और दूसरी पैर में ही फंसी रह गई। वह गोली आज भी उनके पैर में फांसी हुई है।

इस वीर जवान ने बताया, 'एक साल से ज्यादा मेरा इलाज दिल्ली सेना के बेस हॉस्पिटल में चला। मुझे भी औरों की तरह पेट्रोल पंप आवंटित होने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश पेट्रोल पंप नहीं मिल सका। इसके बाद जीवनयापन करने के लिए मुझे करीब 5 बीघा जमीन दी गई।

मैंने उस पर फलों का एक बाग भी लगाया। वह जमीन का टुकड़ा भी करीब 3 साल तक मेरे पास रहा, लेकिन बाद में मुझसे छीन लिया। 2 बेटे हैं जिनकी पढ़ाई भी पैसों के अभाव में छूट गई। पेंशन और इस जूस की दुकान से घर का खर्च मुश्किल से चलता है।'

तोलोलिंग में मिली जीत, हमारे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी लेकिन तोलोलिंग का युद्ध लड़ने वाले जवान का महत्व शायद अब कुछ भी नहीं है . लांसनायक सतवीर सिंह को हर महीने 22 हज़ार रुपए की पेंशन मिलती है. बहुत से लोगों को ये लगेगा कि ये रकम उनके लिए काफ़ी है. लेकिन सच ये है कि दिल्ली जैसे महंगे शहर में इस रकम से अपने परिवार, अपनी बीमारी और अपनी मजबूरियों पर विजय प्राप्त करना बहुत मुश्किल है. अपने बेटे को पढ़ाने के लिए सतवीर सिंह को अपने घर में ही जूस की दुकान खोलनी पड़ी. वो हर वक़्त दबाव में रहते हैं. उन्हें HyperTension की बीमारी है और इसके इलाज में भी उनका पैसा खर्च होता है.

1999 के बाद से भारत में हर वर्ष विजय दिवस मनाया गया है लेकिन सतवीर सिंह के जीवन में सही मायने में एक नये विजय दिवस की ज़रूरत है.

Border पर देश की सुरक्षा कर रहे जवान... कभी ये नहीं सोचते कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है ? उनके दिमाग में एक ही बात होती है, अगर देश के लिए जान भी देनी पड़ी तो ज़रूर देंगे . लेकिन ऐसी संकल्प शक्ति हमारे समाज और सिस्टम की रगों में दिखाई नहीं देती.

सच ये है कि जवानों के साथ देश के समाज का रिश्ता एकतरफा नहीं हो सकता. ऐसा नहीं हो सकता कि सैनिक कुर्बानी देते रहें. और समाज और सिस्टम चुपचाप तमाशा देखता रहे.

भारत में 135 करोड़ लोग रहते हैं. अगर ये लोग एक-एक रुपया भी दे दें तो एक ही पल में 135 करोड़ रुपये इकठ्ठे हो जाएंगे.. भारत के ये करोड़ों लोग अगर चाहें तो सभी वीरों का ख्याल रख सकते हैं.

अलग-अलग पार्टियों की सरकारें एक-दूसरे पर आरोप लगाती हैं कि 'आपने युद्ध वीरों का सम्मान नहीं किया' और इसे राजनीति का मुद्दा बनाती हैं.

फ़ौजी के नाम पर ओछी राजनीति करने वाली हर पार्टी और सत्ता में आने वाली हर सरकार, इस फ़ौजी का सामना कर पाएगी?

No comments