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प्रेगनेंसी के दौरान UPSC पास कर अफ़सर बनने वाली डॉ. प्रज्ञा जैन की कहानी


इस दुनिया में हर व्यक्ति का अपना अलग स्वभाव और व्यक्तित्व होता है। हर किसी के अंदर कुछ अच्छाई तथा कुछ बुराइयां होती है। यही विशेषतायें उस व्यक्ति को दूसरों से अलग बनाती हैं, और उसकी पहचान बन जाती हैं। वुडवर्थ ने व्यक्तित्व कों परिभाषित करते हुए कहा था कि–

“व्यक्तित्व व्यक्ति के संपूर्ण व्यवहार का आईना है, जिसका प्रदर्शन उसके विचारों को व्यक्त करने के ढंग, अभिव्यक्ति एवं रुचि, कार्य करने के ढंग, और जीवन के प्रति दार्शनिक विचारधारा के द्वारा किया जाता है।”

किंतु व्यक्तित्व का निर्माण एक दिन में नहीं होता है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। इसके निर्माण में हमारे परिवार, समाज, शिक्षा, अनुभव एवम हमारी सोच का बहुत बडा योगदान है। मेरे व्यक्तित्व का निर्माण भी एक चुनौतीपूर्ण एवम रोचक यात्रा का ही परिणाम है।

मेरी प्रारंभिक शिक्षा एक छोटे से कस्बे बड़ौत में हुई है। यह एक तहसील है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले मे आता है। पिता आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं तथा माँ दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक हैं। प्रारंभ से ही माता-पिता ने अच्छी शिक्षा पर बहुत बल दिया था। 10वीं तथा 12वीं कक्षा में जिला स्तर पर प्रथम रैंक प्राप्त हुई। हमेशा से ही तकलीफ में फंसे लोगों का दुख-दर्द देखकर मन उद्वेलित हो जाता था। इसी कारण डॉक्टर बनने का निर्णय लिया।

पहले बड़ौत में और शादी के बाद दिल्ली में अपना क्लीनिक खोला और तन्मयता के साथ लोगों की मदद की। खुद से जितना बन पडा, उतना गरीब बेसहारा लोगों की मदद की। किंतु कुछ सालों बाद यह लगने लगा कि शायद यह प्लेटफार्म छोटा है, संसाधन सीमित हैं। यही सोचकर UPSC की परीक्षा देने का निर्णय लिया। पहले प्रयास में साक्षात्कार के बाद केवल कुछ अंकों के कारण फाइनल लिस्ट में जगह नहीं मिल पाई, वहीं दूसरे प्रयास में स्वास्थ्य ख़राब होने और मानसिक तनाव के कारण प्रीलिम परीक्षा में भी सफलता हासिल नहीं मिली।


तीसरे प्रयास के समय भी प्रेगनेंसी में बेड रेस्ट की सलाह होने के बावजूद मैंने हिम्मत नहीं हारी तथा हौसला रखकर परीक्षा से साक्षात्कार तक का सफर तय किया। आखिरकार तीसरे प्रयास में सफलता हासिल हुई तथा भारतीय पुलिस सेवा में चयन हुआ।

सामाजिक जागरूकता तथा देशप्रेम की अभिव्यक्ति का अवसर खाकी ने दिया। किंतु यहाँ भी नयी चुनौतियाँ थीं। ट्रेनिंग के समय 6 माह की बेटी को छोड़कर जाना भी बहुत मुश्किल था तथा प्रेगनेंसी के बाद शारीरिक व्यायाम जैसे कि 16 किमी की दौड, घुडसवारी, तैराकी इत्यादि के स्तर को पाना भी मुश्किल था। साईकिलिंग के दौरान हुई दुर्घटना में दोनो हाथों की हड्डी मे फ्रैक्चर भी हुआ परंतु हौसले एवं सकारात्मक सोच को नहीं छोड़ा। इन्ही के बल पर न केवल इन सभी चुनौतियों का सामना किया अपितु स्वंय के लिये एक नई दिशा भी मिली।

हर व्यक्ति विशेष होता है। हर किसी में अपनी खूबियां होती हैं। बस अपने नजरिए पर निर्भर करता है कि हमारा जीवन किस ओर अग्रसर होता है।

‘ना थम, ना हार, मुस्कुरा और चला चल |

जी यह जीवन कुछ इस तरह, कि लाखों की मिसाल बन।’

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