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पहली बार बीड़ी पीने के बाद गांधीजी का था ये रिएक्‍शन



गांधी जी के बारे में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो हमें पता नहीं। ऐसा नहीं है कि वो महात्मा गांधी ने बताई नहीं। बल्कि ऐसा है कि हमने पढ़ी ही नहीं। खैर, उनकी ऑटोबायोग्राफी है। यानी उनकी आत्मकथा। नाम है ‘सत्य के प्रयोग’, इसमें गांधी जी ने बताया है कि पहली बार जब उन्होंने बीड़ी पी, तो उनका मन विचलित हो गया था। तब उनकी पिता की आंखों से निकला आंसू उनके जीवन का सबसे दुखी चित्र बन गया।
बीड़ी पीने का चढ़ा था शौक

गांधी जी लिखते हैं, ‘अपने एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीड़ी पीने को शौक लगा। हमारे पास पैसे नहीं थे। हम दोनों में से किसी का यह ख्याल तो नहीं था कि बीड़ी पीने में कोई फायदा है। पर गंध में भी आनंद नहीं आता था। हमें लगा सिर्फ धुआं उड़ाने में ही कुछ मजा है। मेरे काकाजी को बीड़ी पीने की आदत थी। उन्हें और दूसरों को धुआं उड़ाते देखकर हमें भी बीड़ी फूकने की इच्छा हुई।’
वो काकाजी की जूठी बीड़ी



गांधी जी आगे लिखते हैं, ‘गांठ में पैसे तो थे नहीं, इसलिए काकाजी पीने के बाद बीड़ी के जो ठूंठ फेंक देते, हमने उन्हें चुराना शुरू किया। पर बीड़ी के ये ठूंठ हर समय मिल नहीं सकते थे और उनमें से बहुत धुआं भी नहीं निकलता था।’

फिर लगे पैसे चुराने

गांधी जी लिखते हैं, ‘हमने इसलिए नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से एकाध पैसा चुराने की आदत डाली। हम बीड़ी खरीदने लगे। पर सवाल यह पैदा हुआ कि उसे संभाल कर रखे कहां? हम जानते थे कि बड़ों के देखते तो बीड़ी पी ही नहीं सकते। जैसे-तैसे दो-चार पैसे चुराकर कुछ हफ्ते काम चलाया। इसी बीच सुना कि एक पौधा होता है जिसके डंठल बीड़ी की तरह जलते हैं। फूंके जा सकते हैं। हमने फिर उन्हें खोजा और फूंकने लगे।’
आत्महत्या करने का किया फैसला


‘हमें दुख इस बात का था कि बड़ों की आज्ञा के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते। हम उब गये। हमने आत्महत्या करने का फैसला कर किया। पर आत्महत्या कैसे करें? जहर कौन दें? हमने सुना कि धतूरे के बीज खाने से मृत्यु हो जाती है। हम जंगल में जाकर बीज ले आए। शाम का समय तय किया। केदारनाथजी के मंदिर की दीपमाला में घी चढ़ाया, दर्शन किए और एकांत खोज लिया। पर जहर खाने की हिम्मत न हुई। अगर तुरंत ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा? मरने से लाभ क्या? क्यों न ये सब सह ही लिया जाए? फिर भी दो-चार बीज खाए। अधिक खाने की हिम्मत ही ना हुई। दोनों मौत से डरे…यह निश्चय किया कि रामजी के मंदिर जाकर दर्शन करके शांत हो जाएं और आत्महत्या की बात भूल जाएं।’
फिर छोड़ दी बीड़ी


‘मेरी समझ में आया कि आत्महत्या का विचार करना सरल है। आत्महत्या करना सरल नहीं। आत्महत्या के इस विचार का परिणाम यह हुआ कि हम दोनों जूठी बीड़ी चुराकर पीने की और नौकर के पैसे चुराकर बीड़ी खरीदने और फूंकने की आदत भूल गए। फिर कभी बड़ेपन में पीने की कभी इच्छा नहीं हुई। मैंने हमेशा यह माना है कि यह आदत जंगली, गंदी और हानिकारक है। दुनिया में बीड़ी का इतना जबरदस्त शौक क्यों है? इसे मैं कभी समझ नहीं सका हूं। रेलगाड़ी के जिस डिब्बे में बहुत बीड़ी पी जाती हैं, वहां बैठना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है और धुएं से मेरा दम घुटने लगता है।’

पिता जी के सामने स्वीकार किया अपना दोष


‘फिर मैंने फैसला किया कि कभी चोरी नहीं करूंगा। मुझे लगा कि पिताजी के सम्मुख अपना दोष स्वीकार भी कर लेना चाहिए। पर जीभ न खुली। पिताजी मुझे पीटेंगे, इसका डर तो था ही नहीं। मुझे याद नहीं कि कभी हममें से किसी भाई को पीटा हो। पर खुद दुखी होगे, शायद सिर फोड़ लें। मैंने सोचा कि यह जोखिम उठाकर भी दोष कबूल कर लेना चाहिए, उसके बिना शुद्धि नहीं होगी । आखिर मैने सोचा चिट्ठी लिखकर दोष स्वीकार किया जाए और माफी मांग ली जाए। मैंने चिट्ठी लिखकर हाथोंहाथ दी। चिट्ठी में सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही। मैंने विनती की कि वे अपने को दुख में ना डालें। कांपते हाथों चिट्ठी पिताजी के हाथ में दी। मैं उनके तख्त के सामने बैठ गया। उन दिनों वे बीमारी से पीड़ित थे, इस कारण बिस्तर पर ही लेटे रहते थे।’
रो पड़े पिता जी

‘उन्होंने चिट्ठी पढ़ी। आंखों से मोती की बूंदे टपकी। चिट्ठी भीग गई। उन्होंने क्षणभर के लिए आंखें मूंदी, चिट्ठी फाड़ डाली और स्वयं पढ़ने के लिए उठ बैठे थे, फिर सो गए। मैं भी रोया। पिताजी का दुख समझ गया। अगर मैं चित्रकार होता, तो वह चित्र बना सकता था। आज भी वह मेरी आंखों के सामने इतना स्पष्ट है।’

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