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भूलकर भी न करें ये गलती, कान में हो सकती बड़ी समस्या


कान हमारे शरीर की एक महत्वपूर्ण इंद्रिय है जिसके बिना हमारी दुनिया में सन्नाटा होता. कीड़े-मकोड़े, तेज आवाजें, हवा-पानी तथा अन्य विषैले तत्व कान की अंदरूनी मशीनरी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे किसी भी नुकसान से बचने के लिए कान (ear) में वैक्स (wax) का निर्माण होता है जिसे सेरोमन कहते हैं. वैक्स हमारे कानों की सुरक्षा के लिए प्रकृति द्वारा दिया गया सुरक्षा कवच है. इसका बनना कोई रोग नहीं अपितु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. वैक्स बनने का तरीका, उसकी मात्रा तथा उससे उत्पन्न होने वाली कोई भी तकलीफ चिंता का कारण बन सकती है.

सूखा और तरल वैक्स ये दो प्रकार के वैक्स हमारे कान में बनते हैं. किस व्यक्ति में कितना वैक्स बनेगा और कितनी मात्रा में बनेगा यह व्यक्ति की आनुवांशिक कृति पर निर्भर करता है. परन्तु यही वैक्स यदि अधिक मात्रा में बनने लगे और अंदरूनी कैनाल के पास सूखकर इक्ट्ठा हो जाए तथा नहाते, मुंह धोते या अन्य किसी कारण से कान में पानी चला जाए तो यही वैक्स फूलकर कान के अंदरूनी तंत्र को नुकसान पहुंचाने लगता है.

वास्तव में कान के अंदर की कैनाल सीधी नहीं होती अपितु यह आधी अवस्था में होती है. जैसे ही हम कान के भीतर जमी वैक्स निकालने के लिए तीली, पिन या बड्स डालते हैं तो यह वैक्स बाहर निकलने की बजाए अंदर की ओर खिसककर फंस जाती है. जब किसी कारण से कान में पानी चला जाता है तो यह फूल जाती है.

इस प्रकार की फूली हुई वैक्स को इम्पैक्टिड वैक्स कहते हैं जो कान के भीतर कैनाल को दबाना शुरू कर देती है. अंदरूनी कैनाल पर पड़ने वाले इस दबाव के कारण कई लोगों में कम सुनने की शिकायत हो सकती है. हो सकता है कि मरीज कानों में या दिमाग में घंटियां सी बजने की शिकायत भी करे. साथ ही कानों में खारिश होना तथा कानों में या कानों के पीटे की और हल्के या तेज दर्द की शिकायत भी हो सकती है.

यदि वैक्स के कारण एक्सर्टनल आडिटरी कैनाल पूरी तरह बंद हो जाए तो मरीज को 30 डेसीबल तक आवाज सुनाई देना कम हो सकता है.

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