Breaking News

स्त्री हो या पुरुष ये काम एकांत में करना चाहिए


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है कि भजन हो या भोजन - सदा एकांत में ही करने चाहिए। हमारे प्राचीन दार्शनिकों ने इस साधारण लगने वाले वाक्य में बहुत गहरे मर्म की बात कही है।

इसके अलावा शास्त्रों में अनेक बातों का जिक्र किया गया जिनके बारे में एकांत को जरूरी माना गया है। जानिए, ऐसे ही कुछ कार्य जो एकांत में करेंगे तो उसके फायदे ज्यादा होंगे।

1. शास्त्रों में दान की अपार महिमा बताई गई है। हर युग में अनेक भामाशाह हुए हैं जिन्होंने देश और मानवता के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया।

कहा जाता है कि अगर आपको कोई वस्तु, धन, अन्न आदि दान करने हैं तो उसका सबसे अच्छा तरीका है एकांत में दान करिए। आप दानी हैं, यह दुनिया को बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

सभी पदार्थ ईश्वर की देन माने जाते हैं। अगर मनुष्य के पास वे पर्याप्त मात्रा में हैं तो ईश्वर का आभारी होना चाहिए। गुप्त रूप से दिए गए दान का विशेष महत्व है।

कहा जाता है कि जिसने अपनी प्रसिद्धि के लिए दान दिया, उसका फल उसे प्रसिद्धि के रूप में ही मिल गया। उसका आध्यात्मिक रूप से महत्व नहीं रहता।

2. ईश्वर से प्रार्थना हमें आत्मिक ऊर्जा देती है। इस संबंध में लोगों के अपने विश्वास हैं और धार्मिक मान्यताएं भी। अगर ईश्वर से प्रार्थना करनी हो, पूजन करना हो तो उसके लिए एकांत सबसे श्रेष्ठ है।

जहां तक संभव हो एकांत में ही प्रार्थना करें। हालांकि इसका यह तात्पर्य नहीं है कि अगर एकांत न हो तो प्रार्थना न करें। ईश्वर को तो किसी भी स्थान और समय पर स्मरण किया जा सकता है, लेकिन अगर स्थान पवित्र और एकांत में हो तो यह विशेष लाभदायक होता है। इससे व्यक्ति का मन नहीं भटकता। वह पूरा मन भगवान से ही लगाता है।

3. प्राचीन दार्शनिकों व आयुर्वेद के ज्ञाताओं ने यह स्वीकार किया है कि भोजन एकांत में और चुपचाप करें तो बेहतर होता है।

आयुर्वेद में तो हर ग्रास को 32 बार चबाने तक का विधान है। यह पाचन और पेट के लिए बहुत लाभदायक माना गया है। कहा जाता है कि भीड़ वाली जगह पर भोजन करने से मनुष्य जल्दबाजी में भोजन करता है।

वह ग्रास को उस मात्रा में नहीं चबा सकता जितना जरूरी होता है। इस प्रकार दांतों की गलती आंतों को भुगतनी पड़ती है। अगर संभव हो तो भोजन एकांत में और आवश्यक बातों का पालन करते हुए ही करना चाहिए।

4. धार्मिक प्रार्थनाओं की तरह ही मंत्र जाप के लिए भी एकांत जरूरी है। मंत्रशास्त्र के अनुसार, भीड़ वाली जगह पर अनुष्ठान आदि करने से सिद्धि प्राप्त होने में संदेह रहता है।

मंत्र जाप के लिए एकांत पहली जरूरत है। कहा जाता है कि अगर अपने इष्ट पर पूरा भरोसा हो और विधि सही हो तो मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है, लेकिन इन जरूरतों के साथ एकांत न हो तो सिद्धि मिलना असंभव ही है।

5. प्राचीन समय में गुरुकुल शहरों से बाहर वन में होते थे। वहां विद्वान गुरु उन्हें शिक्षा देते थे। शहरों के शोर और आकर्षण से बिल्कुल मुक्त रहकर अध्ययन करने से उन गुरुकुलों से राम, कृष्ण, अर्जुन, चाणक्य जैसी महान विभूतियों का उदय हुआ।

आज परिस्थितियों के कारण हर विद्यालय का एकांत में होना तो संभव नहीं है, लेकिन अगर विद्यार्थी चाहे तो घर पर अध्ययन के दौरान टीवी, इंटरनेट, फोन जैसे साधनों से दूर रहकर पूरा मन पढ़ाई में लगाए तो उसे भी एकांत कहा जा सकता है।

6. कूटनीति के महान आचार्य चाणक्य ने एकांत को बहुत महत्व दिया है। उन्होंने राजा के कर्तव्य बताते हुए कहा है कि गुप्त मंत्रणा सदैव एकांत में करनी चाहिए और उसके बारे में अयोग्य लोगों को नहीं बताना चाहिए।

जो राजा इसका उल्लंघन करता है वह मुश्किलों को आमंत्रण देता है। इसी प्रकार चाणक्य ने राजा के शयन करने के संबंध में भी कहा है कि शयन सदैव एकांत में ही करना चाहिए और उस जगह को बदलते रहना चाहिए।

7. विद्यार्थी और राजा की तरह योगी के लिए भी एकांत जरूरी है। शास्त्रों में कहा गया है कि योग का अभ्यास करने वाले व्यक्ति के लिए एकांत आवश्यक है।

वह उन स्थानों पर जाकर योगाभ्यास न करे जहां अधिक लोग आते हों या जहां मन में भटकाव हो। खासतौर से किसी जलाशय के नजदीक योगाभ्यास करने के संबंध में इसका निषेध किया गया है।

वहां अधिक लोगों का आवागमन होता है। इसी प्रकार योगी को उन तमाम स्थानों से दूर रहकर योगाभ्यास करना चाहिए जो उसकी साधना में बाधक हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो योगी के लिए एकांत बहुत जरूरी है।

8. लेखन को समाज का दर्पण कहा जाता है और मूर्ति तथा अन्य कलाएं समाज को सुंदर बनाती हैं। कहा जाता है कि किसी ग्रंथ का अध्ययन एकांत में किया जाए तो उसकी बातों पर ठीक तरह से मनन किया जा सकता है।

उसी प्रकार अगर लेखक किसी पुस्तक की रचना करता है तो उसे भी यह एकांत में ही करना चाहिए। लेखक की सबसे बड़ी पूंजी उसके शब्द होते हैं।

अगर वह एकांत में इसका सही तरीके से इस्तेमाल करेगा तो रचना बहुत सुंदर होगी। इसी प्रकार मूर्तिकार या इस श्रेणी का कोई और कलाकार एकांत में कला की साधना करे तो वह उसकी गहराइयों में जाकर उसे और सुंदर बना सकता है। भीड़ व शोरगुल वाली जगह कला के लिए उपयुक्त नहीं होती।

9. इन कार्यों के अलावा शास्त्रों व दार्शनिकों ने तांत्रिक पूजन के लिए एकांत को जरूरी माना है। ऐसा माना जाता है कि तांत्रिक पूजन की चर्चा लोगों से करने पर साधना निष्फल होती है या उसमें बाधाएं आती हैं। इसी प्रकार शिशु को दुग्धपान के लिए भी एकांत को श्रेष्ठ माना गया है।

No comments