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कार्तिक अमावस्या ही नहीं कार्तिक पूर्णिमा के दिन भी मनाई जाती है दीवाली



ये तो आप जानते ही हैं कि हर साल कार्तिक मास की अमावस्या पर दीपों का त्यौहार दीवाली बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. लेकिन कार्तिक महीने की अमावस्या ही नहीं बल्कि इस मास की पूर्णिमा को भी दीवाली मनाई जाती है. 

जी हां...इसे देव दिवाली (Dev Diwali) के नाम से जाना जाता है. इस दिवाली का भी उतना ही महत्व होता है जितना कि अमावस्या के दिन आने वाली दिवाली का. चलिए बताते हैं इस बार कब है देव दीवाली और क्या है इसका पौराणिक महत्व.

क्यों कहते हैं देव दिवाली(Dev Diwali 2020)

धार्मिक मान्यताओं की मानें तो देव दीवाली के दिन देवलोक से सभी देवता वाराणसी यानि काशी में आते हैं. यही कारण है कि इस दिन काशी नगरी को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और विशेष इंतज़ाम यहां किए जाते हैं.

कब है देव दीवाली 2020?

यह विशेष दीवाली हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है. यानि कि अमावस्या की दीवाली के ठीक 15 दिन बाद. इस बार यह दीवाली 30 नवंबर को है. इस दिन पूजा प्रदोष काल में की जाती है. जिसका इस बार शुभ मुहूर्त शाम 05.08 बजे से लेकर 07.47 बजे तक है. इसी दौरान पूजा करना शुभ रहेगा. 

देव दीवाली का महत्व

अब सवाल ये कि आखिर यह देव दीवाली इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और इसके साथ क्या धार्मिक महत्व जुड़ा है. कहा जाता है कि इसी दिन यानि कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का संहार किया था. जिससे सभी देवता काफी प्रसन्न हुए और खुशी के चलते वो भगवान शिव के साथ काशी पहुंचे और दीप जलाकर खुशियां मनाई. तब से ही काशी में कार्तिक पूर्णिमा मनाई जाती रही है. इस दिन विशेष रूप से दीप दान किया जाता है. 

लगाई जाती है गंगा में आस्था की डुबकी

कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान का विशेष महत्व माना गया है. इस दिन गंगा में आस्था की डुबकी लगाने के लिए लाखों की तादाद में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं. गंगा ही नहीं इस दिन किसी भी पवित्र नदी में स्नान किया जा सकता है. कहते हैं इस दिन गंगा में एक डुबकी जन्मों जन्मों के बंधन से मुक्त कर देती है. और पापों का नाश करती है.

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