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हिमाचल: एक कोस की पैदल शोभायात्रा के बाद क्षेत्र की जनता को मिलते हैं तीन वरदान...


पच्छाद उपमंडल के क्वागधार में बुधवार को भूरेश्वर महादेव मंदिर में देव आस्था के साथ ग्यास का पर्व मनाया गया। हालंकि इस बार लोगों की संख्या कोविड के चलते कम थी। मगर फिर दिन भर लोग अपने आराध्य देव के दर्शन के लिए बारी-बारी आते-जाते रहे। भूरेश्वर महादेव मंदिर में होने वाला यह ग्यास का पर्व अपने आप में गहरा इतिहास समेटे हुए हैं। यहां पर आयोजित होने वाली परंपराएं अलग तो है, वही यहां पर होने वाला चमत्कार भी किसी से छिपा नहीं है। 

भूरेश्वर महादेव शोभा यात्रा की यह विशेषता है कि यहां पर देवता पालकी में नहीं, बल्कि देव शक्ति पुजारी में प्रवेश करती है। पारंपरिक शृंगार से सुसज्जित होकर साक्षात देवता के रूप में पुजारली मंदिर से क्वागधार मंदिर के लिए अढ़ाई किलोमीटर यानी एक कोस की यात्रा मंदिर तक पैदल की जाती है। बुधवार दोपहर बाद को देवस्थली पुजारली में देवता का सिंगार करने के बाद विशेष बाना (पारंपरिक पोशाक) धारण करने के बाद पगड़ी व छत्र देवता को पहना कर शोभायात्रा शुरू हुई। जोकि करीब एक घंटे का सफर पैदल चढ़ाई की और चढऩे के बाद मंदिर में जाकर संपन्न हुई।

क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भी शोभायात्रा में भाग लिया और देवता के पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के साथ भूर्शिंग महादेव का जयकारा लगाते हुए चलते रहे। एक कोस की चढ़ाई चढ़ते हुए जो 7 स्थान चिन्हित किए गए हैं, वहां पर दूध की धार देव रूप में पुजारी द्वारा लगाई जाती है। दूध की आठवें धार मोड़ में पहुंचते ही शिला पर दूध चढ़ा कर पूरी की जाती है। उसके बाद मंदिर में प्रवेश किया जाता है। एक विशेष परंपरा के अनुसार 22 गोत्रों द्वारा आगे की रस्में शुरू होती हैं। मंदिर में देवता की पगड़ी के अंदर जुड़े छात्र को शिवलिंग पिंडी पर सजा दिया जाता है।

मुख्य कारदार पोलिया इन रस्मों को पूरा करवाते हैं। जिसमें चावरथिया उपगोत्र खेल के कारदार देवता को शक्ति परीक्षण के लिए जलती हुई बत्ती देते हैं, जिसे देवता मुंह में लेते है। कारदार अपने कुल देवता के ऊपर चांवर झूलाता है। देर रात को पुजार द्वारा घनघोर अंधेरे में दूध-घी से भरी हुई तिरछी शिला पर छलांग लगाकर क्षेत्र की जनता को तीन वरदान दिए जाते हैं।

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