Breaking News

ये हैं किस्मत बनाने वाले करौरी बाबा, स्टीव जाॅब्स और मार्क जुकरबर्ग भी ले चुके हैं इनसे आशीर्वाद


समय खराब हो तो ईश्वर याद आते ही हैं। ये बात सिर्फ भारतीयों के लिए ही लागू नहीं होती बल्कि स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग पर भी सही साबित हुई है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जब दुनिया के ये दिग्गज पर्सनैलिटी कारोबार में नुकसान में जा रहे थे तो वे उत्तराखंड के कैंची धाम के हनुमान मंदिर गए थे। इसका जिक्र खुद जुकरबर्ग ने पीएम मोदी से मुलाकात में किया था।

एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भारतीय आध्यात्म के मुरीद हैं। दोनों की उत्तराखंड के कैंची धाम मंदिर और खासकर स्वर्गीय नीम करौली बाबा में आस्था है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुई मुलाकात में फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बताया था कि जब उनकी कंपनी एक मुश्किल दौर में थी, तब स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत के एक आश्रम में जाने की सलाह दी थी।

जुकरबर्ग के मुताबिक उन्हें भी वहां जीवन को बदलने वाले एक आध्यात्मिक प्रतिबिंब का एहसास हुआ था। भारतीय आध्यात्म से बेहद प्रभावित स्टीव जॉब्स 1970 के आसपास उत्तराखंड के नैनीताल जिले में बने कैंची धाम आश्रम आए थे। यह आश्रम नीम करौली बाबा के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि नीम करौली बाबा हनुमान के बहुत बड़े भक्त थे। स्टीव जॉब्स का कहना था कि यहां आने के बाद ही उन्हें अपनी कंपनी ‘एप्पल’ को बनाने का रास्ता दिखाई दिया था।

आस्था और मान्यता का केंद्र कैंची धाम

उत्तराखंड के नैनीताल में भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे स्थित कैंची धाम मंदिर अपनी स्थापना के बाद से ही लगातार श्रद्धा और आस्था का केंद्र रहा है। समय के साथ ही बाबा नीम करौली महाराज के भक्तों की संख्या में लगातार बढ़ती जा रही है। इस मंदिर की मान्यता है कि यहां सच्ची भक्ति और दिल से मांगी गई हर मुराद बाबा के आशीर्वाद से पूरी होती है।

हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट भी नीम करौली बाबा से बेहद प्रभावित रही हैं और भारतीय आध्यात्म में उनकी रुचि भी उन्हीं की वजह से रही।

क्या है कैंची धाम मंदिर की स्थापना के पीछे के कहानी
उत्तराखंड में स्थित कैंची धाम मंदिर की स्थापना के पीछे भी रोचक कहानी है। महाराज नीम करौली के मन में उठी मौज ही उनका संकल्प बन गयी। ऐसी ही मौज में बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की। स्थानीय लोगों का कहना है कि साल 1942 में कैंची निवासी पूर्णानंद तिवारी सवारी के अभाव में नैनीताल से गेठिया होते हुए पैदल ही कैंची की ओर वापस लौट रहे थे, तभी एक स्थूलकाय व्यक्ति कंबल लपेटे हुए नजर आया तो पूर्णानंद डर गए।

उस व्यक्ति ने पूर्णानंद को उनका नाम लेकर पुकारा और इस समय उनके वहां पहुंचने का कारण भी बता दिया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं बाबा नीम करौली महाराज थे। बाबा ने पूर्णानंद से कुछ और बातचीत की और निडर होकर आगे बढ़ने को कहा। तब पूर्णानंद ने बाबा से पूछा कि अब कब उनके दर्शन होंगे तो बाबा ने जवाब दिया कि 20 साल बाद। यह कहकर बाबा ओझल हो गए।

ठीक 20 साल बाद बाबा नीम करौली महाराज तुलाराम साह और श्री सिद्धि मां के साथ रानीखेत से नैनीताल जा रहे थे, तभी बाबा जी कैंची में उतर गए और कुछ देर तक पैराफिट में बैठे रहे, वहीं उन्होंने पुरानी याद ताजा की और वह स्थान देखने की इच्छा जताई जहां साधु प्रेमी बाबा और सोमवारी महाराज ने वास किया था।

24 मई 1962 को बाबा ने पावन चरण उस भूमि पर रखे, जहां वर्तमान में कैंची मंदिर स्थित है। इस तरह बीस साल पुरानी मनसा शक्ति ने कैंची धाम की स्थापना की। तब बाबा ने कैंची धाम में उस समय घास और जंगल के बीच घिरे चबूतरे और हवन कुंड को ढकने को कहा। आज इस जगह हनुमान जी का मंदिर है। इसी में सोमवारी बाबा की धूनी के अवशेष आज भी सुरक्षित हैं। 15 जून 1964 को मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की गई और तभी से 15 जून को प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

No comments