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लाखों की नौकरी छोड़ बने किसान, अब “जीरो बजट” खेती कर बचा रहे 12 लाख रुपए


आज हम आपको मध्य प्रदेश के एक ऐसे ही किसान की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिन्होंने बैंक की नौकरी को छोड़कर प्राकृतिक तरीके से खेती की शुरूआत की है। 

मध्य प्रदेश के विदिशा के रहने वाले संकल्प शर्मा पुणे स्थित भारती विद्यापीठ से एमबीए करने के बाद बैंकिंग सेक्टर में नौकरी कर रहे थे। लेकिन, वह अपने नौकरी से खुश नहीं थे और साल 2015 में नौकरी छोड़, उन्होंने खेती (Agriculture) शुरू कर दी।
संकल्प शर्मा

संकल्प ने द बेटर इंडिया को बताया, “करीब 10 वर्षों तक बैंकिंग सेक्टर में नौकरी करने के बाद, मुझे एहसास हो गया था कि मैं इस सेक्टर में आगे तो बढ़ रहा हूँ, लेकिन काम वही कर रहा हूँ। इसलिए मैंने साल 2015 में नौकरी छोड़ खेती करने का फैसला किया, जिसके प्रति मेरा बचपन से ही लगाव था।”

वह आगे बताते हैं, “उस वक्त मेरी सैलरी 1 लाख रुपए थी, इस वजह से नौकरी छोड़ने का मेरा फैसला काफी जोखिम भरा था। मुझे एहसास था कि मैं खेती में पहले दिन से ही लाभ नहीं कमा सकता हूँ, इसलिए मैंने अगले 2 वर्षों के लिए अपने खर्च को काफी सीमित कर लिया।”

संकल्प के पास 12 एकड़ पैतृक जमीन है। अपनी नौकरी छोड़ने के बाद, उन्होंने इस पर टमाटर, अदरक, प्याज, लहसुन, मिर्च, उड़द और मक्का आदि की खेती शुरू की।
पंचस्तरीय मॉडल से बागवानी करते हैं संकल्प

लेकिन, संकल्प ने देखा कि लोगों में शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक खाने को लेकर जागरूकता की कमी है और बाजार में मिलने वाले फल, सब्जी और अनाज में रासायनिक उर्वरकों की वजह से पोषक तत्व गायब हो रहे हैं। इसी से उन्हें प्राकृतिक खेती (Agriculture) का विचार आया।

संकल्प कहते हैं, “मैं प्राकृतिक खेती को सीखने के लिए साल 2016 में पद्मश्री सुभाष पालेकर जी से मिला। इस दौरान, उन्होंने मुझे खेती में प्राकृतिक तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ अपने लागत को न्यूनतम करने की जानकारी दी।”

बड़े पैमाने पर करते हैं शरबती गेहूँ की खेती

संकल्प, फिलहाल अपने 10 एकड़ जमीन पर शरबती गेहूँ की खेती करते हैं। इस गेहूँ की देश में सबसे अधिक माँग है। खास बात यह है कि इस गेहूँ को तैयार करने के लिए बस एक बार सिंचाई करने की जरूरत पड़ती है, वहीं किसी दूसरे किस्म के गेहूँ की 3-4 बार सिंचाई करनी पड़ती है।

संकल्प के खेत में लगे गेहूँ के फसल

संकल्प कहते हैं, “मैं शरबती गेहूँ की खेती साल 2016 से कर रहा हूँ। हमारे पास प्रति एकड़ 12-14 क्विंटल शरबती गेहूँ का उत्पादन होता है। बाजार में रसायनिक तरीके से उपजाई गई शरबती गेहूँ की दर 3000-3200 रुपए प्रति क्विंटल है। लेकिन, हम प्राकृतिक तरीके से उपजाते हैं। इस वजह से हमें 5000-6000 का दर आसानी से मिल जाता है।”

किस तकनीक के साथ करते हैं खेती

संकल्प बताते हैं, “प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ हैं – जीवामृत, बीजामृत, मल्चिंग और वापसा। मैं जिस जमीन पर खेती कर रहा हूँ, वहाँ पहले केमिकल फार्मिंग होती थी। ऐसे में, मिट्टी के टेक्सचर को बदलना जरूरी था। इसके लिए मैंने पानी के साथ खूब जीवामृत का इस्तेमाल किया, ताकि खेत की उर्वरक क्षमता बढ़े।”

वह आगे बताते हैं, “मैं अपनी खेती (Agriculture) में खाद के तौर पर, सिर्फ गाय के अपशिष्टों का इस्तेमाल करता हूँ। वहीं, कीटनाशकों को नीम, अमरूद और आम की पत्तियों की रस में लहसन, अदरक और मिट्टी मिलाकर बनाता हूँ।”

संकल्प ने अपने खेती कार्यों में पद्मश्री चिंताला वेंकट रेड्डी के तकनीक को अपनाने के साथ-साथ खेती के फाइव लेयर तकनीक को भी अपनाया है। संकल्प के खेत में लगा पपीता

उन्होंने कहा, “चिंतला वेंकट रेड्डी के सीवीआर स्वॉयल टेक्निक के तहत मैं अपने खेत के 3-4 फीट अंदर की मिट्टी को निकालता हूँ और 200 लीटर पानी में करीब 30 किलो मिट्टी का घोल बनाता हूँ। यह मिट्टी काफी चिकनी होती है और कुछ पैमाने पर ऊपरी मिट्टी को भी मिलाने के बाद, इसका छिड़काव फसल पर किया जाता है।”

वह बताते हैं, “इस प्रक्रिया से फसल में लगे कीट और फंगस खत्म हो जाते हैं और उन्हें बीमारियों से दूर रखने में मदद मिलती है। वहीं, ऊपरी मिट्टी के इस्तेमाल की वजह से फसल को बढ़ने में भी काफी मदद मिलती है, क्योंकि इसमें ह्यूमस होता है, जो एक उर्वरक का काम करता है।”

संकल्प का विचार, खेती कार्यों (Agriculture) में मानवीय हस्तक्षेप को कम करने का है, जिससे पौधों को स्वतः बढ़ने में मदद मिले और साथ ही इसका लाभ पर्यावरण को भी हो। इसके लिए उन्होंने साल 2016 में खेती के फाइव लेयर तकनीक को अपनाया है।



वह बताते हैं, “इस तकनीक के तहत, मैं अपने शेष दो एकड़ जमीन पर, अमरूद, पपीता, नींबू, सीताफल जैसे फलों के साथ-साथ टमाटर, अदरक और दलहनों की खेती करता हूँ। यह एक बगीचे जैसा होता है, जिसमें पौधों को न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ बढ़ने में मदद मिलती है।”

कितना होता है लाभ

संकल्प बताते हैं, “मैं अपने खेती कार्यों को नर्मदा नेचुरल फार्म के जरिए करता हूँ। इसके तहत, मैं अपने उत्पादों को तीन तरह से बेचता हूँ – थोक और खुदरा। आज मेरे ग्राहक दिल्ली, मुम्बई, पुणे, रायपुर, बेंगलुरु समेत पूरे देश में हैं।”

इस तरह, संकल्प को अपने खेती कार्यों से हर साल करीब 12-13 लाख रुपए की बचत होती है। अपने इस काम के लिए उन्होंने 5 लोगों को नियमित रूप से नौकरी भी दी है।

क्या है भविष्य की योजना

संकल्प बताते हैं, “मेरा इरादा छोटे किसानों को एकजुट कर एक ऐसा मंच तैयार करना है, जिससे उन्हें एक बेहतर बाजार मिले और इसमें कोई बिचौलिया न हो। इससे किसानों को अधिक लाभ मिलने के साथ ही, ग्राहकों का खर्च भी कम होगा। इस तरह, समाज में एक मिथक भी टूटेगा कि प्राकृतिक उत्पाद महंगे होते हैं।”

संकल्प ने अपना एक यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया है, इसके तहत उनका उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती (Agriculture) के बारे में जागरूक करना है।संकल्प के खेत में लगे सीताफल

वह बताते हैं, “मैंने अपना यूट्यूब चैनल फरवरी, 2020 में शुरू किया था। इसके जरिए मैं लोगों को प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देता हूँ। कुछ ही महीने में मेरे 25 हजार से अधिक सब्सक्राइबर हो गए हैं। मैं लोगों के इस प्रतिक्रिया से काफी उत्साहित हूँ।”

सरकार से अपील

संकल्प सरकार से अपील करते हैं, “भारत में प्राकृतिक खेती को लेकर अपार संभावनाएं हैं। लेकिन, लोगों में इसे लेकर जागरूकता नहीं है। इसके लिए सरकार को पहल करनी होगी और जिला स्तर पर किसानों के समक्ष ऐसे सफल मॉडल पेश करने होंगे, जिससे उन्हें प्राकृतिक खेती में यकीन हो।”

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