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मातृभूमि के चरणों में प्राण न्यौछावर, 21 बरस से डायरी में ढूंढ़ते हैं परिजन


बेटे ने मातृभूमि के चरणों में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, अंतिम समय में उसका चेहरा भी नहीं देख पाए। लेकिन उसकी डायरी लिखने की आदत ने यादों को हमारे जहन में ताजा रखा है। यह कहना है शहीद लेफ्टिनेंट अमित भारद्वाज के पिता ओपी शर्मा और मां सुशीला शर्मा और बहन सुनीता का। करगिल विजय दिवस के 21 बरस पूरे होने पर जयपुर के इस लाल के परिजनों से हमने बात की। पिता ने किस्सा बताया कि दिल्ली में कमांडो कोर्स करने के दौरान 21 वर्ष पहले 5 मार्च को वह अपने दोस्त संजू के साथ इंडिया गेट, कनॉट पैलेस घूम रहा था। अमित ने संजू से कहा कि एक दिन मेरा भी नाम यहां होगा। तब किसने सोचा था ऐसा होगा, लेकिन उसकी बात सच साबित हुई। क्योंकि वहां अब बने वॉर मेमोरियल में अमित का भी नाम है।

नहीं लगी प्रतिमा
शहीद की बहन सुनीता ने बताया कि तत्कालीन महापौर मोहनलाल गुप्ता ने 40 स्थानों पर उनके नाम से वाचनालय की घोषणा की थी। लेकिन अभी तक एक भी नहीं बना। दूसरी और पार्क में आज तक उनकी प्रतिमा भी नहीं लगी।

अमित की डायरी के कुछ खास पन्ने

02 अक्टूबर 1998
न जाने क्यों एक सुकून सा लगता है, अकेले, मीलों दूर सबसे तन्हा बैठना। सामने पर्वत शृंखला के मस्तक को चूमता बर्फ का मुकुट, किनारों को सहलाती बहती हुई शिंगो नी, न जाने अपने आप में क्या कहानी किस्से समेटती आ रही है। वजू के लिए कितने ही हाथ, पांव, मुख इस नदी के जल से पाक हुए होंगे। फिर भारत में प्रवेश कर अनके हाथों ने प्रात:काल अंजलि में इसी जल को लेकर सूर्य नमस्कार किया होगा। जो उसके जल का उपयोग विभिन्न विधि के लिए करते हैं, एक-दूसरे के जान के पीछे पड़े हैं।

19 अक्टूबर 1998
आज दीपावली है, रोशनी का प्रतीक, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक, घर से मीलों दूर इन बर्फीली पहाडिय़ों में कड़ाके की ठंड में जी जान से सरहद की सुरक्षा में डटे मेरे बहादुर साथी वादियों में गूंजती आर्टा फायर की आवाज, अपने हथियारों पर डटे बहादुर जाट और बर्फ में खड़ा चौकस संतरी दुश्मन के हर फायर का दुगने जोश से जवाब देते हुए, पर मन कहीं और भटक रहा है। आज तीसरी दिवाली है घर से दूर। अकेले बंकर में बैठे हुए घर से दूर, पर मन के एक कोने में जरूर बैठ है नन्हा बालक जो मचल रहा है अपनी मां के हाथ की मिठाई खाने को।

17 जुलाई 1992
मुझे मनुष्य रूप धारण करने का अवसर मिला, मैं आज 'गॉड फादर' उपन्यास पढ़ रहा हूं, ऐसा लग रहा है जैसे मैं ही गॉड फादर मिचेल हूं। खैर यह तो संभव नहीं, लेकिन मेरी एक इच्छा है कि मैं अकेला ही बुराइयों एवं बुरे लोगों के खिलाफ संघर्ष करूं जो मानवता के लिए कंटक हैं।

चेहरा भी नहीं देख पाए थे
15 मई 1999 को साथी जवानों की तलाश में गए अमित की टीम पर दुश्मनों ने फायरिंग कर दी थी। बजरंग चोटी पर वे शहीद हुए थे। बेटी सुनीता को पता चला कि वह शहीद हो चुके हैं, लेकिन किसी को नहीं बताया। जब दो महीने बाद युद्ध विराम हुआ और भारत ने इलाके को अपने कब्जे में लिया तो 15 जुलाई को अमित की पार्थिव देह जयपुर आई। हम उसके चेहरे को देख भी नहीं सके। क्योंकि दो महीने से उसका शरीर पहाड़ों में पड़ा था।

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