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संजीवनी बूटी से कम नहीं गूलर का फल है, आप भी जानें इसके गुण


दुनिया में प्रचलित समस्त धर्मों में वृक्षों को पूजनीय दर्जा प्राप्त है। कोई भी धर्म पेड़ों का निरादर नहीं करता क्योंकि यह स्वच्छ पर्यावरण और पृथ्वी पर प्राणियों के जीवित रहने के लिए आवश्यक है। हालांकि हाल के अनेक वर्षों में वृक्षों के अंधाधुंध दोहन और कटाई के कारण पृथ्वी से तेजी से वृक्षों की संख्या घटी है। इसका खामियाजा बिगड़ते पर्यावरण के रूप में झेलना पड़ रहा है।

गूलर के कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है तथा पके फल खाए जाते हैं। इसकी छाल का चूर्ण बनाकर या अन्य प्रकार से उपयोग किया जाता है। गूलर के नियमित सेवन से शरीर में पित्त एवं कफ का संतुलन बना रहता है। इसलिए पित्त एवं कफ विकार नहीं होते। साथ ही इससे उदरस्थ अग्नि एवं दाह भी शांत होते हैं।

उल्टी के साथ खून आने पर कमलगट्टे और गूलर के फलों के 5 ग्राम चूर्ण को दूध के साथ दिन में दो तीन बार सेवन करने से वमन के साथ खून आना बंद हो जाता है।

रक्त शर्करा हमारे शरीर के लिए आवश्यक होता है लेकिन इसकी अधिक मात्रा शरीर के लिए घातक हो सकती है। गूलर के पेड़ में रक्त शर्करा को कम करने वाले गुण होते हैं। इसके लिए आप गूलर के पेड़ की छाल का काढ़ा उपयोग कर सकते हैं। गूलर की छाल रक्त शर्करा को कम करने में फायदेमंद हो सकता है।

चेचक में गूलर के पत्तों पर जो फफोले या श्यामवर्ण के दाने होते है, उन्हें पत्तों से निकालकर लगभग 3-4 ग्राम को गौदुग्ध में मिलाकर छानकर शहद में मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से चेचक के दाने में मवाद नहीं होने पाती।

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