Breaking News

आसमान से देखने पर ''मिनी इंडिया'' नजर आता है ''खेतड़ी का किला'', जानिए और क्या है खास


राजस्थान के झन्झुनू ज़िले में खेतड़ी नामक कस्बा अपनी कॉपर खदान के लिए खासा मशहूर है। यह शेखावाटी का एक क्षेत्र है।

वास्तव में खेतड़ी दो कस्बों में बंटा हुआ है। इनमें से एक वह है जिसे राजा 'खेत सिंहजी निर्वान' ने बसाया था। .
बहुत-से लोगों ने दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में 170 किमी दूर और जयपुर से उत्तर-पूर्वी दिशा में 150 किमी दूर स्थित
खेतड़ी के बारे में सुना भी नहीं होगा.

यह मनोरम स्थान राजपूत गौरव का इतिहास-स्थल है जो आज अतीत की लोक कथाओं और किस्सों में सिमट कर रह गया है.... .

दरअसल किले को आसमान से देखने पर यह भारत के नक्शे की बनावट में दिखाई पड़ता है। किले की मोटी-मोटी दिवारे आसमान से साफ दिखाई देती है जो हरे रंग के पडाड़ों पर 'भारत का मिनी मैप' बनाते है।
यह वही खेतड़ी है जिसकी ओर कभी नरेंद्रनाथ दत्त नाम का शख्स (उसे उस समय स्वामी बिबिदिशानंद के
नाम से जाना जाता था) आर्थिक मदद के लिए बार-बार रुख करता और तात्कालिक शासक अजित
सिंह बहादुर को लंबे-लंबे पत्र लिखकर अपने विचारों से रू-ब-रू कराता था.. . अजित सिंह स्वामी के शिष्य थे और
उन्होंने ही विवेकानंद नाम सुझाया था. 

शिकागो में सितंबर 1893 में विश्व धर्म संसद में अपना मशहूर व्याख्यान देने के बाद स्वामी विवेकानंद लौटकर
सबसे पहले खेतड़ी ही आए थे... खेतड़ी ही वह जगह है जहां बचपन में
मोतीलाल नेहरू को लेकर उनके बड़े भाई नंदलाल आए थे.

नंदलाल वहां के राजा फतेह सिंह के दीवान बनने से पहले शिक्षक थे. इसी खेतड़ी में नंदलाल ने 1870 में फतेह
सिंह की मौत की खबर को छिपा लिया था और पास स्थित अलसीसर से अजित सिंह
को नौ साल की उम्र में गोद लेकर उनका उत्तराधिकारी बनवाया था. .

बाद में नंदलाल आगरा चले गए और अंत में वकालत करने के लिए इलाहाबाद में बस गए, जिनकी विरासत को उनके छोटे भाई मोतीलाल और फिर बाद में मोतीलाल के बेटे जवाहरलाल ने आगे बढ़ाया.

आज करीब 150 साल बाद भी खेतड़ी उत्तराधिकार के मुकदमों का गवाह बना हुआ है जहां अंदाजन 2,000 करोड़ रु. से ज्यादा कीमत की संपत्ति के मालिकाना हक पर जंग छिड़ी हुई है, जिनमें एक तीन सितारा हेरिटेज होटल है, जयपुर का खेतड़ी हाउस है और शहर में पहाड़ी पर स्थित गोपालगढ़ का किला है जो लावारिस पड़ा हुआ है. यह सारी संपत्ति 1987 में खेतड़ी के आखिरी शासक राय बहादुर सरदार सिंह की मौत के बाद से राज्य के संरक्षण में है.. .

पहले विश्व युद्ध में खेतड़ी से 14,000 सैनिकों को लडऩे के लिए भेजा गया था, जिनमें 2,000 ने अपनी जान दे दी थी.
आज वही खेतड़ी लापरवाही, भ्रम, छल-कपट अंतहीन मुकदमों की चपेट में है.

No comments