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औरतें क्यों नहीं काटती हैं साबुत कद्दू, काफी गहरा है इसका रहस्य


आज हम आप लोगों को अपनी पोस्ट के माध्यम से यह बताएंगे की साबुत कद्दू को औरतें क्यों नहीं काटती हैं। भारत में कद्दू को कई नामों से पुकारते हैं जैसे- कद्दू, काशीफल, मखना न जाने कितने नाम हैं इसके और न जाने कितनी भ्रांतियां भी इसके साथ जुड़ी हुई हैं। इन सब के बीच में कद्दू को बेहद सम्मान से देखा जाता है। इसे महिलाएं अपना बड़ा बेटा मान काटने से बचती हैं और कुछ औरतें इसे बड़े बेटे की बलि देने समान समझती हैं इसीलिए वह कद्दू नहीं काटती है। 

वहीं आदिवासी समाज इसे सामाजिक फल मानता है और इसे चुराने वाले को दंडित करता है। संभवत: तमात विशेषताओं के चलते ही दुनिया में कद्दू एक मात्र ऐसी सब्जी है जिसके नाम से बाकायदा 29 सितंबर को विश्व कुम्हड़ा दिवस मनाया जाता है। इसीलिए सभी जगह पर कद्दू को आमतौर पर सब्जी के लिए ही उपजाया जाता है। इसके कई व्यावसायिक उपयोग है। आयुर्वेद में भी इसे औषधीय फल के रूप में महत्व दिया जाता है। बस्तर के गांवों में कद्दू लगाना अनिवार्य माना जाता है, इसलिए ग्रामीण इसे अपनी बाड़ी में या घर में मचान बनाकर रोपते हैं।

काटना यानि बड़े बेटे की बलि देने जैसा हिंदू समाज में कुम्हड़ा और रखिया का पौराणिक महत्व है।

विभिन्न् अनुष्ठानों में जहां बतौर बकरा के प्रतिरूप में रखिया की बलि दी जाती है। वहीं कद्दू को ज्येष्ठ पुत्र की तरह माना जाता है। बस्तर की आदिवासी महिलाएं भी इसे काटने से घबराती है। लोक मान्यता है कि किसी महिला द्वारा कद्दू को काटने का आशय अपने बड़े बेटा की बलि देना होता है, इसलिए महिलाएं पहले किसी पुरुष से कद्दू के दो टुकड़े करवाती हैं, उसके बाद ही वह इसके छोटे तुकड़े करती हैं।

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