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हिमाचल: चुनावों से पड़ती है ऐसी गहरी दरार सालोंसाल बात नहीं करते रिश्तेदार

हिमाचल: चुनावों से पड़ती है ऐसी गहरी दरार सालोंसाल बात नहीं करते रिश्तेदार


हिमाचल प्रदेश में इन दिनों पंचायती चुनाव को लेकर तैयारी बड़ी जोरोशोरों से चली हुई हैं। इस बीच एचपीयू के शोधकर्ताओं का एक सर्वे सामने आया है। अंतर्विषयक विभाग द्वारा किए गए सर्वेक्षण में 91.1 प्रतिशत लोगों ने माना है कि चुनाव के दौरान पारिवारिक रिश्तों में ऐसी दरार पड़ती है कि सालोंसाल रिश्तेदार आपस में बात नहीं करते। 
प्रदेश के हर जिले की पंचायतों में जाकर एचपीयू के शोध कर रहे छात्रों का यह सर्वे सामने आया है। सर्वेक्षण में यह भी खुलासा हुआ है कि 89.2 प्रतिशत लोग सर्वसम्मति से अपनी पंचायतों के प्रतिनिधियों को चुनना चाहते हैं, इसकी दो खास वजह हैं, एक तो पंचायत के कायक्रमों में टकराव नहीं रहता और सभी सदस्यों में सामंजस्य रहता है, दूसरा कारण है कि पंचायत चुनावों में सामाज सूक्ष्म स्तर पर लोगों में पारिवारिक संबंध तक ताक में लग जाते हैं।

91.1 प्रतिशत लोगों ने माना कि इन चुनावों से आपसी समाज में आपसी रिश्तों में टकराव पैदा हो जाते हैं, जो सालोंसाल सामान्य नहीं होते। 87.8 प्रतिशत लोग मानते हैं कि पंचायत स्तर पर आपसी राजनीति के कारण विकास कार्यों में अड़चनें पैदा होती हैं और विकास कार्य पूर्ण नहीं होते या होते ही नहीं। 85.8 प्रतिशत लोग मानते हैं कि अगर पंचायतें सर्वसम्मति से चुनी जाती हैं, तो विकास कार्यों को अच्छे तरीके से किया जा सकता है और गांवों में तरक्की की जा सकती है।






उत्तरदाताओं में से 50 प्रतिशत लोग मानते हैं कि पंचायतों का सर्वसम्मति से चुनाव के लिए सहमति बनना मुश्किल होता है, लेकिन वे आशावादी थे कि प्रयास तो किए जाने चाहिए। 75.1 प्रतिशत लोग यह भी मानते हैं कि पंचायत चुनाव गैर दलीय आधार पर होने के बावजूद जब अलग-अलट राजनीतिक दल सत्ताधारी दल सहित इन चुनावों में प्रतिनिधियों आधिकारिक रूप से घोषित करते हैं, तो पंचायती राज के चुनाव राजनीतिक पार्टियों के चिन्हों पर ही होने चाहिए। 60.4 प्रतिशत लोग मानते हैं कि जब संसदीय व विधानसभा चुनावों की तरह ही पंचायती राज चुनावों के दौरान भी आचार संहिता लागू होती है, तो इन चुनावों को भी राजनीतिक पार्टियों के आधार पर होना चाहिए। 57.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि दलिय आधार पर चुनाव होने से स्थानीय निकायों में विकास कार्यों के क्रियान्वन की जवाबदेही व्यक्तिगत न होकर दल की होगी और विपक्षीय दल भी खुल कर विरोध और आलोचना कर सकता है, जिसकी संभावना वर्तमान गैर दलीय चुनाव होने कारण कम रहती है।

यह तो एक त्रासदी ही होगी

विश्वविद्यालय के अंतविर्षयक विभाग सर्वेक्षण की रिपोर्ट देखें, तो लोगों का पंचायतों की ग्राम सभाओं में वह उत्साह नहीं दिखता, जो पंचायत राज के चुनाव में होता है। देश के बजट के एक बडे़ हिस्से को गावों के विकास कार्यों पर खर्च करने का दायित्व इन संस्थाओं पर होता है। यह एक त्रासदी ही होगी कि अगर जन-सहभागिता नहीं होगी, तो इस बजट का खर्च सही तरीके से हो रहा है या नहीं, यह एक शोध का विषय बन जाता है।

ग्रामसभा की बैठकों में कभी कोरम पूरा नहीं होता

हैरानी इस बात कि है कि सर्वेक्षण में यह भी खुलासा हुआ है कि 83.2 प्रतिशत लोगों का मानना है कि पंचायतों में जो ग्रामसभा बैठकें होती भी हैं, वह अपनी तय तिथि में लोगो की भागीदारी यानि कोरम पूरा न होने की वजह से स्थगित करनी पड़ती हैं। 55.7 लोग मानते हैं कि ग्राम सभा की बैठकों में कोरम पूरा न होने के कारण पंचायत रजिस्टर पर गांव-गांव जाकर लोगों से हस्ताक्षर करवाए जाते हैं, ताकि कोरम पूरा करने की खाना पूर्ती की जाए।

उम्मीदवारोें का मुख्य उद्देश्य यह हो

हालांकि अधिकांश 97.1 लोगों का मानना है कि ग्राम विकास की हर योजना ग्रामसभा में ही पारदर्शी तरीके से पारित होनी चाहिए, जिसमें पंचायत के अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो। 83.8 प्रतिशत लोगों का मानना है कि अगर पंचायतों में होने वाले कार्यों में पारदर्शिता होगी, तो इससे भी लोगों का विश्वास पंचायत प्रतिनिधियों पर बढ़ेगा और जन भागीदारी भी बढे़गी। 78.4 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वर्तमान पंचायती राज के चनुव में उम्मीदवारों का ग्रामसभा में जन भागीदारी को बढ़ाना मुख्य मुद्दा होना चाहिए।

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