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जानिए 'लोहड़ी' का सही अर्थ और महत्व

जानिए 'लोहड़ी' का सही अर्थ और महत्व

आज फसलों का त्यौहार 'लोहड़ी' है। आम तौर पर इसे सिक्ख और पंजाबी परिवार मनाते हैं। मकर संक्रांति से पहले मनाया जाने वाले इस त्यौहार को लोग बहुत ही हर्षो-ल्लास से मनाते हैं। मकर संक्रांति 2016: क्या होगा आपकी लाइफ पर असर आईये जानते हैं इस खूबसूरत त्योहार लोहड़ी' के बारे में कुछ खूबसूरत बातें नीचे की स्लाइडों के जरिये... 'लोहड़ी' का अर्थ ल (लकड़ी) +ओह (गोहा = सूखे उपले) +ड़ी (रेवड़ी) = 'लोहड़ी' ..का यह मतलब होता है। कथाएं दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही इस पर्व पर अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से 'त्यौहार' (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि) भेजा जाता है। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त ही इसमें दिखाई पड़ता है।
 
परंपरा लोहड़ी से 20-25 दिन पहले ही बालक एवं बालिकाएँ 'लोहड़ी' के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। संचित सामग्री से चौराहे या मुहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाई जाती है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली.. लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल में धूम धाम से मनाया जाता है। दुल्ला भट्टी की कहानी लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। 

कहते हैं दुल्ला भट्टी नामक एक व्यक्ति मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। 

उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न केवल मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी की हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई इसलिए लोहड़ी का हर गीत उसे समर्पित होता है।

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