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लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था, जानिए 'लोहड़ी' का सही अर्थ और महत्व

लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था, जानिए 'लोहड़ी' का सही अर्थ और महत्व

लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था यह शब्द तिल तथा रोड़ी (गुड़ की रोड़ी) शब्दों के मेल से बना है लोहड़ी बेटियों की सुरक्षा एवं सम्मान का प्रमुख त्यौहार है। सरकार ने भले ही अब बेटी बचाओ अभियान चलाया हो, लेकिन लोहड़ी से जुड़ा है दुल्ला भट्टी नाम का प्रसंग, जिसने बेटियों की सुरक्षा की प्रेरणा सबको दी थी। यह लोहड़ी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल में धूमधाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लखनऊ में भी यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है।

लोहड़ी को पहले तिलोड़ी कहा जाता था। यह शब्द तिल तथा रोड़ी (गुड़ की रोड़ी) शब्दों के मेल से बना है, जो समय के साथ बदल कर लोहड़ी के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

ऐतिहासिक महत्त्व किसी समय में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं, जिनको उनका चाचा विधिवत शादी न करके एक राजा को भेंट कर देना चाहता था। उसी समय में दुल्ला भट्टी एक नामी डाकू ने दोनों लड़कियों, सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उनकी शादियां कीं। इस मुसीबत की घडी में दुल्ला भट्टी ने लड़कियों की मदद की और लड़केवालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का विवाह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया।

कहते हैं कि दुल्ले ने शगुन के रूप में उनकी झोली में एक सेर शक्कर डालकर ही उनको विदा किया था। यह भी कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी लोई की याद में यह पर्व मनाया जाता है। इसीलिए इसे लोई भी कहा जाता है। भारतीय त्यौहारों को लेकर विदेशों में भी विशेष लगाव है। यहां तक कि अप्रवासी भारतीय तो अपने देश के इन त्यौहारों को लेकर खास तौर पर उत्साहित होते हैं वे वहां भी इस त्यौहार को धूमधाम से मनाते हैं।

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