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हिमाचल के मलाणा क्रीम का नाम तो कई बार सुना होगा, आज उससे जुड़ी कुछ ख़ास बातें जान लो

हिमाचल के मलाणा क्रीम का नाम तो कई बार सुना होगा, आज उससे जुड़ी कुछ ख़ास बातें जान लो

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले में है मलाणा गांव. इस गांव को वीड(गांजा) का तीर्थ कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी. मलाणा क्रीम चरस या हैश या हशीश है जिसे वीड या गांजे के पौधे से बनाया जाता है. इस गांव में वीड प्राकृतिक तौर पर भी उगता है और ग़ैरक़ानूनी ढंग से भी उगाया जाता है. ये पहाड़ों का वीड हब ही है. यूं तो पहाड़ों पर कई जगह गांजा, हैश आदि मिल जाएंगे लेकिन मलाणा क्रीम की बात ही कुछ और है. मलाणा गांव में देश ही नहीं दुनिया का सबसे अच्छा वीड उगाया जाता है. 

मलाणा गांव से जुड़े कई क़िस्से, रहस्य और सवाल हैं. हैश फूंकते सैलानियों का धुंआ छंटने पर जो मलाणा गांव दिखता है वो गहरी खाईयों और बर्फ़ीले पहाड़ों से घिरा है. Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार इस गांव की आबादी, 2500 से भी कम है. दूर-दूर से लोग यहां आकर, प्रकृति की गोद में बैठकर सुकून से रहते हैं, नशा करते हैं. मलाणा के लोगों के लिए चरस पवित्र है, वो इसे ग़लत नहीं मानते. मलाणा में इसे 'बूटी छानना' कहा जाता है.

ऐसे बनता है मलाणा क्रीम

भारतीयों के लिए गांजा का सेवन नया नहीं है ग़ौरतलब है कि गांजा का सेवन ग़ैरक़ानूनी है. मलाणा गांव अच्छे क्वालिटी का हैश (मलाणा क्रीम) के लिए फ़ेमस है. हैश का ये फ़ॉर्म सबसे शुद्ध माना जाता है. यूं तो देशभर में हैश मिल जाता है लेकिन उनमें केमिकल्स की मात्रा अधिक होती है.
Cannabis Species (इस पौधे के Biological Classification पर मतभेद है) के एक पौधे से बनता है मलाणा क्रीम. मलाणा के लोग हाथ से रगड़कर ये हैश तैयार करते हैं. ये हैश क्रीम जैसी दिखती है.

दुनिया में भारत का मलाणा क्रीम और केरला गोल्ड काफ़ी मशहूर है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, केरल सरकार की ऐंटी-नारकोटिक पॉलिसीज़ की वजह से केरला गोल्ड आसानी से नहीं मिलता. मलाणा की बात अलग है, ये गांव बाहर की दुनिया से काफ़ी अलग है, एक तरह से बाहरी दुनिया से काफ़ी अनजान है. यहां सिर्फ़ मलाणा के लोग ही रहते हैं और यहां ज़मीन का क़ानून चलता है. इसलिए मलाणा क्रीम मिलना आसान है. मलाणा के लोग हाथ से रगड़कर हैश तैयार करते हैं. ये गांव भले अपने हैश के लिए जाना जाता हो लेकिन इस गांव से जुड़े अन्य मशहूर क़िस्से भी हैं.

मलाणा क्रीम क्यों है ख़ास?

Cannabis पौधे में कई केमिलक कंपाउंड होते हैं जिन्हें Cannabinoids कहा जाता है. इस पौधे में मौजूद Tetrahydrocannabinol (THC) की वजह से हाई सेन्सेशन महसूस होते हैं. इस पौधे के स्ट्रैन्स (जिनमें THC की मात्रा कम हो) का इस्तेमाल रस्सी, काग़ज़, टेक्स्टाइल आदि में भी होता है. जिन पौधों में Cannabinoids जैसे CBD (Cannabidiol) की मात्रा ज़्यादा होती है उसका इस्तेमाल दवाई बनाने में होता है.
कहा जाता है कि मलाणा क्रीम में THC की मात्रा काफ़ी ज़्यादा होती है. पौधे से निकाले गये Resin (पौधे की राल) को हाथों से रगड़ा जाता है. हैश ऑयल बनाने के लिए इसे ज़्यादा Concentrated बनाया जाता है. मलाणा के चरस में अलग ख़ुशबू और फ़्लेवर होता है और इसकी वजह है यहां की आबो-हवा.

मलाणा क्रीम की क़ीमत  Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, 10 ग्राम मलाणा क्रीम की क़ीमत 1500 रुपये से 8000 रुपये तक हो सकती है. ये क्रीम की शुद्धता पर और क्रीम कहां बिक रहा है इस पर निर्भर करता है. चरस की तस्करी दूर-दराज़ के इलाकों में भी होती है और क़ीमत भी बढ़ जाती है. देश के बाहर तस्करी होने के बाद इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है. मलाना क्रीम एमस्टरडैम के कैफ़ेज़ में भी मिलती है और उसकी क़ीमत सोने जितनी ही होती है!

ग़ैरक़ानूनी होने के बावजूद कैसे होता है प्रोडक्शन

मलाणा गांव बेहद दूर-दराज़ में बसा है और बाक़ी दुनिया से अलग-थलग है. यहां के लोगों ने अपनी अलग संस्कृति बना ली है. मलाणा गांव तक पहुंचने का सबसे नज़दीकी रास्ता भी गांव से चार किलोमीटर की दूरी पर है, ये सड़क 2007 में बनी थी. सड़क बनने से पहले यहां के लोगों को बाज़ार जाने के लिए भी 26 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी, जिसमें 12 से 15 घंटे लगते थे. 
 
कुछ दशक पहले मलाणा दुनिया के मानचित्र पर उभरा और दुनियाभर के Psychedellic Drug यूज़र्स यहां पहुंचने लगे. 1986 में NDPS Act के तहत चरस भारत में बैन हो गया लेकिन ये पौधा आज भी कुल्लू का अहम फसल है. कनेक्टिविटी अच्छी होने के बाद मलाणा और पास की पार्वती घाटी ड्रग यूज़र्स का अड्डा बनने लगी है. सिक्योरिटी एजेंसी के लोग कई दिनों तक ट्रेक करके गै़रक़ानूनी वीड के खेतों को नष्ट करते हैं और 'ड्रग टूरिज़्म' पर रोक लगाने की कोशिश करते हैं.

मलाणा से जुड़े अन्य क़िस्से

BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, मलाणा के बाशिंदे सिकंदर के सैनिकों के वंशज हैं. जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया तब उसके कुछ सैनिकों ने मलाणा गांव में शरण ली थी और मलाणा के निवासी उन्हीं सैनिकों के वंशज है. यहां के लोगों का जेनेटिक परीक्षण नहीं हुआ. यहां के लोगों की कद-काठी से ये कहानी सच्ची लगती है. यहां के लोगों की ज़बान हिमाचल के बाक़ी लोगों से अलग है. ये हैं लोग कनाशी भाषा बोलते हैं. बाहरी लोगों को ये भाषा नहीं सिखाई जाती क्योंकि यहां के लोग इस भाषा को बेहद पवित्र मानते हैं. स्थानीय लोग हिंदी समझते हैं लेकिन बातों का जवाब कनाशी में ही देते हैं. यहां के लोग हाथ मिलाने और गले मिलने से भी परहेज़ करते हैं और बाहरी लोगों से ज़्यादा मिलना-जुलना पसंद नहीं करते. नई पीढ़ी घुलती-मिलती है लेकिन पुराने लोग ज़्यादा मेल-जोल पसंद नहीं करते.

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