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पथरी के प्रकार उपचार बचाव के 15 तरीके

पथरी के प्रकार उपचार बचाव के 15 तरीके

आज हमारे देश में लगातार पथरी की समस्या बढती ही जा रही है.. लगतार इससे जुड़े मामले बढे जा रहे है, हो भी क्यों न.. लोगो की लगातार लापरवाहियो के कारण यह अपने पाँव पसार रहा है. पथरी की समस्या दिखने में भले ही आपको छोटी लगे पर इसके परिणाम गंभीर होते है आइये जानते है पथरी के बारे में.

अश्मरी (पथरी) क्या है : पेट के विभिन्न अंगों में से कहीं खनिज लवणों अथवा पाचन के बाद बचे अपशिष्ट पदार्थों के जमाव से पथरी बनती है। पथरी समस्या अधिकांषतया वृक्क(किड्नी) में पायी गयी है, वैसे तो यह मूत्राषय, पित्ताशय, लार-ग्रंथियों एवं अग्न्याशय में भी हो सकती है; यह जानना रोचक है कि वृक्काष्मरी स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों में काफ़ी अधिक देखी गयी है तथा प्रोस्ट्रेट ग्लैण्ड की पथरी पुरुषों (विशेषतः वयोवृद्ध पुरुषों में) में ही हो सकती है क्योंकि यह ग्रंथि पुरुषों में ही पायी जाती है।

इस आर्टिकल में हम वृक्काष्मरी पर केन्द्रित जानकारियाँ पेश कर रहे हैं। पथरी के विभिन्न प्रकारों व अन्य अंगों की पथरियों के थोड़े-बहुत लक्षण व बचाव मूलक उपाय लगभग एक-जैसे लग सकते हैं। वृक्कों का क्या काम शरीर में एक जोड़ी वृक्क ख़ून को छानकर साफ करने व उत्सर्जी भाग को मूत्र में ले जाने का कार्य करते हैं।

Kidney Stone Symptoms Treatment in Hindi

पथरी के चार प्रकारः

*. कैल्शियम: इसके साथ फ़ास्फ़ेट अथवा आग्ज़ॅलेट जैसे अन्य खनिजों के मिल जाने से बनी पथरी;

*. स्ट्रुवाइटः मूत्रपथ संक्रमणों के कारण बनने वाली ये पथरियाँ विशाल हो सकती हैं;

*. यूरिक अम्लः ये पथरियाँ कृत्रिम प्रोटीन-सप्लिमेण्ट्स व सोफ़्ट ड्रिंक्स के कारण बन सकती हैं;

*. सिस्टाईन पथरीः कम पायी जाने वाली एक वंशागत स्थिति जिसमें सिस्टीन नामक एक प्रोटीन मूत्र में बनता रहता है। अण्डा व माँस खाने वाले लोगों में यह समस्या अधिक रहती है। वैसे भी अग्नाशय इत्यादि अन्य अंगों की पथरी भी माँसादि से होने की सम्भावना बढ़ जाती है क्योंकि अण्डे इत्यादि में ट्राईग्लिसराइड्स होते हैं।
पथरी के लक्षणः

1. तेज पीड़ा जो पीठ की ओर पसलियों के ठीक नीचे से शुरु हो सकती है क्योंकि उस समय पथरी आपके मूत्रपथ में घूम रही होती है।

2. मूत्र में रुधिर
3. जी मिचलाना एवं उल्टी
4. कँपकँपी, अनावश्यक जैसा पसीना एवं बुखार (संक्रमण हो चुका हो तो मूत्रोत्सर्जन के समय दुर्गंध)
5. सम्भव है कि छोटी-छोटी यूरिक अम्ल पथरियों से बनी कंकड़ जैसी संरचना भी निकले, यदि ऐसा कुछ निकले व आप उसे एकत्र कर पायें तो जाँच के लिये चिकित्सक के पास ले जाकर उसके स्वरूप व सम्भावित कारण का अनुमान लगाना कुछ सरल हो सकता है।
6. अचानक मूत्रवेग होने की आवश्यकता अनुभव होते रहना

पथरी (किड्नी-स्टोन) परखने की जाँचेंः

1. रुधिर-जाँचेंः रुधिर में कैल्शियम व यूरिक अम्ल की मात्रा अतिसीमित हो तो इसका पता लगाने के लिये रुधिर-जाँच करवाकर चिकित्सक वृक्क(गुर्दे) की चिकित्सामक स्थितियों को समझ सकता है।

2. मूत्र-जाँचः इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कहीं आप अत्यधिक पथरी-निर्माण खनिज अथवा बहुत कम पथरी-बचाव पदार्थ तो उत्सर्जित नहीं कर रहे।

3. इमेजिंगः इन परीक्षणों में मूत्रपथ (यूरिनरी ट्रॅक्ट) में वृक्काष्मरी की उपस्थिति पता पड़ सकती है। पेट के साधारण एक्सरे में हो सकता है कि वृक्क की छोटी-छोटी अश्मारियां न दिख पायें परन्तु हाई-स्पीड अथवा डुअल एनर्जी कम्प्यूटराइज़्ड टोमोग्रॅफ़ी में बहुत छोटी अश्मारियां भी दिख सकती हैं।

इमेजिंग परीक्षणों के अन्य प्रकारों में अल्ट्रासाउण्ड नामक एक नान-इन्वेसिव परीक्षण सम्मिलित है तथा अन्तर्शिरीय(इण्ट्रावेनस) यूरोग्रॅफ़ी में भुजा(आर्म) की शिरा में एक रंजक(डाए) प्रवेश कराकर एक्सरे (अन्तर्षिरीय पायलोग्रॅम) लिया जाता है.

सीटी इमेजेज़ (सीटी यूरोग्रॅम) को देखा जा सकता है क्योंकि रंजक वृक्कों व मूत्राषय से होकर गुजर रहा होगा। विकिरण द्वारा जाँच अन्य अ्रगों की अश्मारियों की उपस्थिति व उनके आकार को समझने में भी सहायक है।

4. गतिशील पथरियों का विश्लेषणः इसमें एक छन्ने में मूत्रोत्सर्ग करने को कहा जा सकता है ताकि बाहर निकल रही पथरियों को समेटा जा सके।

पथरी से बचाव के लिये सावधानियाँः

1. पथरी दूर करने व अन्य कई रोगों के उपचार में खायी जाने वाली औषधियों से भी वृक्काष्मरी व अन्य पथरियों की आषंका बढ़ जाती है, इसलिये जब भी चिकित्सक के पास जायें तो अपने खान-पान की आदतों के साथ अतीत के सेवन की गयी औषधियों का विवरण भी बतायें।

2. खाने में नमक की मात्रा यथासम्भव कम रखें एवं ऊपर से नमक मिलाने की आदत भूलें तथा चटपटा खाने की चाह में ख़ूब नमक से तर-बतर प्रोसेस्ड फ़ूड से भी दूर रहें।

3. गाड़ी में बैठकर कार्यालय जाने, कार्यालय में भी बैठकर कार्य करने व घर आकर लेटे-बैठे रहने वाली दिनचर्या बदलें, चला-फिरा करें; अधिकांष कार्यों को पैदल चलते व साइकिल चलाते हुए पूरे करने के प्रयास करें; पैर स्टैण्ड नहीं हैं, इन्हें पहिया समझकर पूरे शरीर को नैसर्गिक रूप से गतिशील रखें। नर्म सीट व सोफ़े जैसी आलस्यवर्द्धक वस्तुएँ व आरामदेह लगने वाली आदतें देह को नुकसान पहुँचाते हुए खींचकर चिकित्सालय में अनैच्छिक आराम करने को विवश कर सकती हैं।

4. बिना जाँच कराये अपने मन से परहेज करने की कोशिश न करें, हो सकता है कि अश्मरी कैल्शियम के बजाय किसी और कारण से हुई हो और आप मान बैठे हों कि मुझे कैल्शियम से हुई है जिससे आप दूध व दुग्धोत्पाद से दूरी बना लेंगे एवं इससे कैल्शियम की कमी हो जाने से अस्थियाँ कमज़ोर होने लगेंगी

5. मद्य, सोडा एवं कोला जैसे कार्बोनेटेड ड्रिंक्स से हमेशा दूर रहें।

6. कुटुम्ब में आनुवंशिक अतीत संदिग्ध होने, स्वयं के शरीर में कोई आशंका लगने पर जाँच करा लें क्योंकि विशेष रूप से वृक्कों में पथरियाँ स्वतः बनती-मिटती रहती हैं एवं कोई लक्षण स्पष्ट नहीं हो पाता, यदि न मिट पा रही हों अथवा/एवं बढ़ गयीं हों तो ही लक्षण सामने समझ आते हैं।

पथरी का उपचारः

1. प्रचुर परिमाण में पानी पीना

2. चोकोलेट व काली चाय जैसे कारकों से यथासम्भव बचें जो पथरी बनाने में भूमिका निभाते पाये गये हैं

3. ध्वनि-तरंगों से पथरियाँ तोड़ना

4. एंडोस्कोप रिमूवलः छोर पर कैमरा लगी एक छोटी-सी नली को मूत्रमार्ग में प्रवेश कराकर मूत्राषय में पथरी को ढूँढकर चिकित्सक उसे तोड़ने का प्रयास कर सकता है ताकि वह मूत्र के माध्यम से निकल सके.

5. पीठ पर छोटा-सा कट बनाकर एक विशेष औजार से पथरी को निकाला जा सकता है

6. उपरोक्त उपचारों के अप्रभावी रहने पर अथवा पथरी बड़ी हो तो बेहोशी देकर कमर में एक छोटा-सा चीरा लगाकर पथरी को बाहर निकाल लिया जाता है जिसके लिये मात्र 1-2 दिन भर्ती होना पड़ सकता है; वृक्क की पथरी निकालने के लिये शल्यचिकित्सा तब भी आवश्यक हो सकती है यदि पथरी बहुत बड़ी हो जिससे उसका अपने आप निकलना सम्भव न हो.

वह पथ में कहीं अटककर विशेष अवरोध उत्पन्न कर रही हो, काफ़ी अवधि के बाद भी पर्याप्त मूत्रोत्सर्ग न हो पा रहा हो अथवा/एवं कष्ट बना हुआ हो, पथरी से मूत्र-प्रवाह अवरुद्ध हो गया हो अथवा मूत्रपथ-संक्रमण हो रहा हो अथवा रक्तस्राव जारी रहे; वैसे आशा का समाचार तो यह है कि अधिकांश मामलों में शल्यचिकित्सा आवश्यक नहीं होती।

7. पित्ताशमरी (पित्त की थैली में पथरी) वास्तव में ऐसे ठोस कण हैं जो पित्ताशय में पित्त के कोलेस्टॅराल व बिलिरुबिन के बने होते हैं तथा उपचार के लिये एक सर्जरी अथवा पूरी थैली को निकालना आवश्यक हो सकता है।

पित्ताशय व यकृत जोड़ने वाली वाहिनियों में पथरी आने/चलने अथवा अटकने से होने वाले अवरोध अथवा पथरी में अग्न्याशय व आँत दोनों की संयुक्त भागीदारी से स्थितियाँ अधिक गम्भीर हो सकती हैं, स्त्रियों को पित्ताशमरी की आशंका अधिक रहती है एवं वजनी होना स्थिति को एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा बना देता है।

खाने के आधे घण्टे बाद पेट में दर्द अथवा दर्दभरी सूजन पित्ताशमरी का चिह्न हो सकती है। प्रायः ऐसा देखा गया है कि पित्ताशमरी का पता तब चलता है जब स्थिति बढ़ चुकी होती है जिस कारण पित्ताशमरी से पिण्ड छुड़ाने के लिये शल्यक्रिया अपरिहार्य हो जाती है।

8. पथरी यदि लार-ग्रंथियों में हो तो दंतचिकित्सक उसे मालिश द्वारा ढकेलकर बाहर निकालने का प्रयास कर सकता है, अन्यथा शल्यक्रिया आवश्यक हो सकती है।

हमारे देश में निरंतर कोई न कोई बीमारी अपना कोहराम मचाती रहती है.. जिसमे कई लोगो की जाने भी चली जाती है. दोस्तों, इन सबसे बचने का सबसे सरल उपाय यही है की आप हमेशा खुद की Care करे और जितना हो सके खुद को फिट रखे. इससे आप फ़ालतू की बीमारियों से हमेशा दूर रहोगे और स्वस्थ रहोगे.

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