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मुंह के इन लक्षणों को यदि किया नजरअंदाज तो जा सकती है जान

मुंह के इन लक्षणों को यदि किया नजरअंदाज तो जा सकती है जान

कोविड-19 महामारी के कारण एक अभूतपूर्व वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा हो गया है। महामारी के कारण फैले संक्रमण को काबू में करने के लिए सरकारों द्वारा सख्त उपायों को लागू करने की वजह से कहीं न कहीं क्लीनिकल गतिविधियां बहुत कम हो रही हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में कोविड-19 के कारण निवारक दंत चिकित्सा उपचार में 63.7 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसने भारत में मुंह के कैंसर के रोगियों के जीवन को बहुत प्रभावित किया है।

तंबाकू से होता है मुंह का कैंसर ओरल कैंसर आज हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधी एक बहुत बड़ी समस्या है, क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक इस समस्या से ग्रस्त हैं- पुरुषों में यह संख्या 16.1 प्रतिशत और महिलाओं में 4.8 फीसदी है। तंबाकू का अत्यधिक उपयोग, सुपारी चबाना, शराब का उपयोग, ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी-टाइप 16), यूवी विकिरण और कुछ आनुवंशिक स्थितियां मुंह के कैंसर को जन्म देती हैं।

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ये लक्षण आते हैं नजर अधिकांश रोगियों में प्रारंभिक अवस्था में रोग के लक्षण भी नजर नहीं आते हैं और इसलिए वे किसी प्रकार की चिकित्सा सहायता नहीं लेते हैं। मुंह के कैंसर के रोगियों में जो शुरुआती लक्षण नजर आते हैं, उनमें प्रमुख हैं- मुंह के छाले या मुंह का अल्सर, दांतों का हिलना, भोजन निगलने में कठिनाई, वजन कम होना और मसूड़ों में रक्तस्राव इत्यादि। ऐसे लक्षण बहुत आम हैं और इस महामारी के दौरान कोविड -19 प्रोटोकॉल के बावजूद इनमें से किसी लक्षण को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

जीवित रहने की संभावनाएं हैं कम मुंह के कैंसर की रोग निदान दर भी बहुत खराब है और जीवित रहने की दर कुल मिलाकर 5 साल यानी 40 प्रतिशत तक है। यदि प्रारंभिक अवस्था (स्टेज1 और स्टेज 2) में निदान किया जाता है, तो जीवित रहने की दर 80 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। 50 प्रतिशत तक मुंह के कैंसर का निदान केवल एक उन्नत चरण (स्टेज 3 और स्टेज 4) में किया जाता है।

समय पर जांच है जरूरी चिकित्सक के अनुसार, मौखिक कैंसर की जांच माध्यमिक रोकथाम का एक महत्वपूर्ण पहलू है और संभावित रूप से प्रारंभिक अवस्था में रोग के बढ़ने की गति को धीमा करने या रोकने में मदद कर सकता है। ओरल कैंसर का निदान निस्संदेह ओरल मेडिसिन के संदर्भ में एक जरूरी प्रक्रिया है, भले ही निदान में देरी रोगी की तरफ से हो या चिकित्सक से संबंधित हो। ओरल केविटी के गहन नैदानिक निरीक्षण के जरिये 99 प्रतिशत तक ओरल कैंसर का पता लगाया जा सकता है।

नोट- यह लेख मैक्स सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के ओनकोलॉजिस्ट डॉक्टर विकास गोस्वामी से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉक्टर विकास गोस्वामी पिछले दस सालों से प्रैक्टिस कर रहे हैं। उन्होंने अपनी डिग्री मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, गांधी मेडिकल कॉलेज और राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर से ली है।

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