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इस प्राचीन मंदिर में आज भी मौजूद है 5 हजार साल पुराना भीम का ढोल और 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना

In this ancient temple, there is still a 5 thousand year old drum of Bhima and a grain of wheat weighing 200 grams.

5 हजार साल पुराना प्राचीन मंदिर : भारत को मंदिरों का गढ़ कहा जाता है, क्योंकि यहां हर प्रकार के देवी-देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर स्थित है, जिनमें विराजमान देवी-देवताओं के दर्शन करने लाखों लोग दूर-दूर से आते हैं। ये मंदिर दिखने में जितने रोचक हैं, उससे भी ज़्यादा रोचक इनकी स्थापना के पीछे की कहानी है। देश-विदेश में घूमने फिरने के लिए बहुत से ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक मंदिर हिमालय की गोद में बसा ममलेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर कई सालों से यहा पर स्थित है। खूबसूरत होने के साथ-साथ लोग यहा पर कई सालों से पड़ी चीजों को भी देखने के लिए आते है। मंडी और शिमला के रास्ते के बीच बने इस मंदिर से आप प्राकृतिक नजारों का मजा भी ले सकते है।

यहां स्थित है ममलेश्वर महादेव मंदिर : हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है क्योंकि यहां पर देवी-देवताओं का वास है। हिमाचल में कई ऐसे प्राचीन मंदिर है जो बहुत ही अद्‌भुत है। ऐसा ही एक अद्‌भुत मंदिर ममलेश्वर महादेव है। ममलेश्वर महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी की करसोगा घाटी के ममेल गांव में स्तिथ है। ममलेश्वर महादेव मंदिर जो की भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस मंदिर का संबंध पांडवो से भी है क्योकि पांडवो ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय इसी गाँव में बिताया था।

पौराणिक कथा : हिमालय की गोद में बसा ममलेश्वर महादेव मंदिर पांडवो के समय का है। पांडवो के समय से बने इस मंदिर में 200 ग्राम गेंहू का दाना अभी तक रखा हुआ है। माना जाता है कि पांडव जब अज्ञातवास के लिए यहा रहने आए तो उन्होंने इसे उगाया था। इसी कारण 5000 हजार साल से इस दाने को संभाल कर रखा गया है। इस दाने के अलावा इस मंदिर में महाभारत काल से मौजूद अग्निकुंड आज भी जल रहा है। इसके अलावा यहां पर महादेव की पांच अद्भुत शिवलिंग को एक साथ देख सकते है। इस शिवलिंग की स्थापना भी पंच पांडवो ने की थी। इसके अलावा 5000 साल से यहां पर भीम देव के ढोल को भी संभाल कर रखा गया है। लकड़ी से बने इस मंदिर में ऐतिहासिक चीजें देखने के साथ-साथ यहां की गई सुंदर नकाशी भी अद्‌भुत है।

पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग : पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग और सबसे प्रमुख गेंहूँ का दाना है, जिसे की पांडवों का बताया जाता है। इस अद्भुत मंदिर में पांच शिवलिंग हैं, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि इनकी स्थापना स्वयं पांडवों ने की थी। इस मंदिर में पांच पांडवों के पांच शिवलिंग स्थापित हैं। ममलेश्वर महादेव मंदिर की यह भी धारणा है कि भगवान परशुराम ने करसोग घाटी में 80 शिवलिंगों की स्थापना की थी और 81वां शिवलिंग भगवान शिव की प्रतिमा के रूप में इस मंदिर में स्थापित किया था। मंदिर की काष्ठ कला और शैली उत्कृष्ट है।

महाभारत कालीन 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना : पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान 200 ग्राम वजनी गेंहूं का दाना उगाया था। यह गेंहूँ का दाना पुजारी के पास रहता है। इस गेंहूँ के दानें को देखने के लिए पुजारी की अनुमति लेना जरुरी है। पुरात्तव विभाग भी इन सभी चीज़ों की अति प्राचीन होने की पुष्टि कर चूका है।



ममलेश्वर महादेव के पास ही एक मंदिर जिसमें दी जाती नर बलि : ममलेश्वर महादेव मंदिर के पास एक प्राचीन विशाल मंदिर है, जो की सदियों से बंद पड़ा है माना जाता है कि इस मंदिर में प्राचीन समय में भूडा यज्ञ किया जाता था जिसमे की नर बलि भी दी जाती थी। तब भी इस मंदिर में केवल पुजारीयो को ही प्रवेश की अनुमति थी। अब भी इस मंदिर में केवल पुजारी वर्ग को ही जाने की आज्ञा है।

अखंड धुना जो लगातार 5000 सालों से जल रहा : इस मंदिर के प्रांगण में आज भी एक धुनी जल रही हैं जिसमें किसी भी प्रकार की कोई भी लकड़ी या फिर अन्य चीज नहीं लगाई जाती हैं। पांडवों के अज्ञातवास के दौरान इस ममलेश्वर महादेव मंदिर गांव में एक राक्षस ने डेरा जमाया था। उसके प्रकोप से बचने के लिए लोगों ने उससे एक समझौता किया। इसके तहत वो रोज एक आदमी को खुद उसके पास भेजते थे। एक दिन जिस घर में पांडव रुके थे, उस घर के एक लड़के की बारी आई। लड़के की मां को रोता देख पांडवो ने कारण पूछा तो उसने बताया कि आज मुझे अपने बेटे को राक्षस के पास भेजना है। फिर भीम उस लड़के की बजाय खुद उस राक्षस के पास गए। भीम के साथ हुए युद्ध में राक्षस की हार हुई।

महाबली भीमसेन की विशालकाय ढोल : मंदिर में एक विशालकाय ढोल भी रखा गया है, जिसे भीम का माना जाता है। कहा जाता है कि भीम ने वापसी के दौरान ढोल को यहीं रख दिया था। पांडवों के साक्ष्य तौर पर अन्य निशानियाँ भी मौजूद हैं जिनमें से एक हैं इस मंदिर प्रांगण में टंगी हुई भीमसेन की ढोल, इसके बारे में भी यही कहा जाता था कि यह ढोल भी महाबली भीम सेन के द्वारा ही बजाई जाती थी।

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