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दो माह तक घास खाकर अंग्रेजों से लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को निमंत्रण देना ही भूल गया प्रशासन

दो माह तक घास खाकर अंग्रेजों से लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को निमंत्रण देना ही भूल गया प्रशासन

देश से अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए आजाद सिंह फौज में शामिल और ताम्रपत्र से पुरस्कृत चंबा जिला के एकमात्र सिपाही गुरुदित्ता मल पुत्र माधो राम व उनके परिवार को सरकार और प्रशासन शायद भूल चुके हैं। 75वें स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य पर स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को समारोह का हिस्सा बनने के लिए एक निमंत्रण पत्र तक नहीं भेजा जा सका है। गुरुदित्ता मल के पुत्र भूपेंद्र दियोड़ ने कहा कि उनके पिता का जन्म 29 जुलाई 1924 को हुआ। 15 वर्ष की आयु में वह सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल हुए।

कहा कि उनके पिता अंग्रेजों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं का जिक्र किया करते थे। अंग्रेजों की गिरफ्त से बचने के लिए उन्होंने व उनके साथियों ने दो माह तक घास खाकर और पानी पीकर ही समय गुजारा। उन्हें जिगरकच्छ और मुल्तान में नजरबंद कर दिया। वर्ष 1946 में वह चंबा अपने घर लौट आए। आजादी की लड़ाई में अहम योगदान देने के लिए गुरुदित्ता मल को वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा ताम्रपत्र से नवाजा गया। 9 अगस्त 2003 को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें पुरस्कृत किया। इसके बाद भी उन्हें गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस सहित अन्य समारोह में भी निमंत्रण दिया जाता रहा। 29 जून 2005 को उनके पिता के निधन पर राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार करवाया गया।

कहा कि कुछ समय पूर्व स्वतंत्रता सेनानी के पोते का कोटे के तहत प्रमाण पत्र बनवाने के लिए तहसीलदार के पास पहुंचने पर तहसीलदार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का परिजन होने का सबूत लाने तक की बात कही। इस पर तहसीलदार को पिता की पेंशनबुक सहित अन्य दस्तावेज तक दिखाने पड़े। कहा कि काफी भागदौड़ करवाने के बाद आखिरकार उपायुक्त कार्यालय के माध्यम से उनके बेटे का प्रमाण पत्र बना। भूपेंद्र दियोड़ ने कहा कि देश की आजादी में अहम योगदान देने पर भी प्रशासन द्वारा दरकिनार करना उनके लिए किसी यातना से कम नहीं हैं। आजादी के लिए प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों व उनके परिवारों को महज किताबों के पन्नों में या स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही याद किया जाता है। उसके बाद सब भूल जाते हैं।

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