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अकाल मृत्यु व प्राकृतिक दुर्घटनाओं में वृद्धि की भविष्यवाणी, देवताओं से लड़ाई में डायनों की जीत

अकाल मृत्यु व प्राकृतिक दुर्घटनाओं में वृद्धि की भविष्यवाणी, देवताओं से लड़ाई में डायनों की जीत

देवता और डायनों के घोघराधार के अंतिम महासंग्राम में डायनें विजयी रही हैं। इससे अच्छी फसल होने की उम्मीद है लेकिन प्राकृतिक दुर्घटनाओं व अल्प मौतों में वृद्धि के संकेत हैं। देवता और डायनों के बीच युद्ध की सबसे पहले भविष्यवाणी प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में 66वीं वार्षिक जाग में की जाती है। 

माता बगलामुखी के गुर अमरजीत शर्मा द्वारा गणेश चतुर्थी की संध्या पर मंदिर के गर्भ गृह में पूजा-अर्चना की गई और देवी द्वारा बताए गए आदेशों का पालन किया गया। चतुर्थी तिथि की अर्द्धरात्रि को गुर ने देववाणी करके भक्तों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने बताया कि इस बार 4 स्थानों पर डायनों और 3 स्थानों पर देवताओं ने जीत दर्ज की है। माता बगलामुखी का 10 महाविद्याओं में आठवां स्थान है जिन्हें शत्रुओं का विनाश करने वाली देवी माना जाता है। संगीत मंडली साईगलू ने पूरी रात मां की महिमा का गुणगान किया। इस अवसर पर भंडारे का भी आयोजन किया गया।

कहां-कहां हुए युद्ध: गुर अमरजीत ने बताया कि इस बार 7 स्थानों पर युद्ध हुए हैं, जिनमें दक्षिण भारत के समुद्र टापू और हिमाचल प्रदेश जिला मंडी की घोघराधार प्रमुख हैं। युद्ध के लिए यह 2 स्थान हर वर्ष निश्चित होते हैं लेकिन बाकी के 5 स्थान बदलते रहते हैं। इस बार गंगातट, कुरुक्षेत्र, सिकंदराधार, शिकारीधार व कांगड़ा किला सम्मिलित हैं। समुद्र टापू से युद्ध की शुरूआत होती है और घोघराधार में अंतिम महासंग्राम होता है।
 
युद्ध के लिए कब रवाना होते हैं देवता और डायनें देवता और डायनें युद्ध के लिए आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी (हिमाचल में शैणदेवी एकादशी के नाम से जाना जाता है) को रवाना होते हैं और भादो मास में सबसे पहला युद्ध समुद्र टापू होता है और इसी तरह अंतिम युद्ध घोघराधार में होता है। युद्ध से पहले देवता और डायनों की सेना 7 भागों में विभाजित होती है जिनका नेतृत्व 7-7 सेनापति करते हैं।

क्या-क्या हुई भविष्यवाणी 4 स्थानों पर डायनों व 3 पर देवताओं के जीतने पर डायनों की विजय मानी गई। इससे फसल में वृद्धि होगी लेकिन अल्प मृत्यु, अकाल मृत्यु, सड़क दुर्घटनाएं, प्राकृतिक प्रकोप व रोग व्याधी में वृद्धि होगी। यदि देवता जीतें तो केवल फसल कम होती है लेकिन जानमाल सहित सभी सुरक्षित रहते हैं और अल्प मृत्यु नहीं होती है।

कैसे मिलती है गुर की पदवी प्रदेश के मंडी जिला के ऊपरी भागों में बीज रूप में आज भी देवत्व के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं। कभी-कभी पानी पर चलने के बाद गुर की पदवी मिलती है तो कहीं पहाड़ों की बड़ी चट्टानों में अदृश्य होने के बाद वहां से प्रमाण सहित निकलने पर गुर की पदवी मिलती है। माहूंनाग के गुर की परीक्षा खाली हाथ सतलुज नदी में छलांग लगाकर हाथ में सूखी मिट्टी लाना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही पत्थर और कैक्टस खाने जैसी कांटेदार चीजें भी सहज भाव से खानी पड़ती हैं।

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