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मार्गशीर्ष माह में कब है उत्पन्ना और मोक्षदा एकादशी, जानें एकादशी महत्व और पूजन विधि

मार्गशीर्ष माह में कब है उत्पन्ना और मोक्षदा एकादशी, जानें एकादशी महत्व और पूजन विधि

कार्तिक महीना (Kartik Month) समाप्त होने को है. 19 नवंबर 2021 कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima 2021) के बाद मार्गशीर्ष माह (Margashirsh Month 2021) की शुरुआत होगी. नए माह की शुरुआत के साथ ही महीने के व्रत और त्योहार भी शुरू हो जाते हैं. हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व है. हर माह में दो एकादशी के व्रत (Ekadashi Vrat) रखे जाते हैं. एक कृष्ण पक्ष में दूसरा शुक्ल पक्ष में. मार्गशीर्ष माह में भी दो एकादशी उत्पन्ना (Utapnna Ekadashi) और मोक्षदा एकादशी (Mokshda Ekadashi) पड़ेंगी. एकादशी का व्रत सभी व्रतों में सबसे कठिन माना जाता है. एकादशी का व्रत भगवान विष्णु (Lord Vishnu) को समर्पित है. इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. आइए जानते हैं मार्गशीर्ष महीने में आने वाली एकादशी की तिथि, महत्व और पूजन विधि के बारे में.

उत्पन्ना एकादशी- मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस बार उत्पन्ना एकादशी 30 नवंबर, मंगलवार के दिन पड़ रहा है. इसे उत्पत्ति एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के बाद ये पहली एकादशी होती है. कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु के लिए सलाना उपवास रखने की शुरुआत होती है. अगर कोई व्यक्ति सलाना उपवास रखना चाहता है, तो उत्पन्ना एकादशी के दिन से उसकी शुरुआत करना उत्तम होता है.

मोक्षदा एकादशी- मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादसी को मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस साल मोक्षदा एकादशी 14 दिसंबर, मंगलवार की पड़ रही है. मान्यता के अनुसार मोक्षदा एकादशी का तात्पर्य है मोह का नाश करने वाली एकादशी से है. कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और व्रत को स्वर्गलोग प्राप्त होता है.

एकादशी पूजन विधि- एकादशी के व्रत में भक्त सूर्योदय से पहले जागते हैं और ब्रह्मा मुहूर्त में स्नानादि करते हैं. इसके बाद उगते सूर्य के दर्शन करके सूर्य देव अर्घ्य देते हैं. फिर पूजा स्थल/ मंदिर की सफाई करने के बाद गंगाजल छिड़क कर पवित्र मंदिर को पवित्र करें. साथ ही, भगवान को गंगाजल से स्नान करवाएं. अब भगवान को रोली, चंदन, अक्षत, पीले फूल, पीली मिठाई आदि अर्पित करें. फूलों से श्रृंगार करने के बाद भगवान को भोग लगाएं. विष्णु भगवान को तुलसी के पत्ते भोग में अवश्य चढ़ाएं. कहते हैं कि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है. अब भगवान गणेश जी की आरती करें. उसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें. अब प्रसाद का वितरण करें.

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