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शिव जी के इस चमत्कारी स्तोत्र की महिमा है बड़ी निराली, हर मुश्किल को करता है दूर

शिव जी के इस चमत्कारी स्तोत्र की महिमा है बड़ी निराली, हर मुश्किल को करता है दूर

Shiv Ji Stotra: व्यक्ति के जीवन में सुख-दुख सदैव आने जाने वाली चीज़ है. कहते हैं कि कभी-कभी दुख और तकलीफें जीवन में ऐसे चिपक जाती हैं कि पीछा ही नहीं छोड़ती. ऐसे में इन स्थितियों के साथ जीना व्यक्ति के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है. कई बार इंसान इस सभी दिक्कतों से पीछा छुड़ाने के लिए कई तरह के उपाय भी अपनाता है . लेकिन शिव पुराण में शिवलिंग की उपासना का लिए शिव लिंगाष्टकम् के बारे में बताया गया है. आपकी हर स्थिति और तकलीफ को दूर कर सकता है ये अत्यंत चमत्कारी और शक्तिशाली लिंगाष्टकम् स्तोत्र.

भगवान शिव का साकार रूप शिवलिंग को माना गया है. मान्यता है कि व्यक्ति का कितना मुश्किल समय भी क्यों न हो, नियमित रूप से शिवलिंग पर जल अर्पित करने के साथ-साथ बेलपत्र आदि चढ़ाएं और साथ में ये महाशक्तिशाली लिंगाष्टकम् स्तोत्र करने हर परेशानी का हल मिल जाता है. और व्यक्ति कुछ ही समय में कष्टों से मुक्त हो जाता है. इतना ही नहीं, कहते हैं कि इसे करने से शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अनन्य कृपा देते हैं. बता दें कि स्वयं देवता भी भगवान की स्तुति इसी स्तोत्र से करते हैं.

अगर आपके जीवन में भी ऐसे ही दुख और कष्ट हैं, जिन्हें आप चाह कर भी दूर नहीं कर पा रहे हैं, तो शिव की शरण में इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करें. आठ श्लोकों वाला ये स्तोत्र आपकी हर मुश्किल को दूर करेगा.

ये है लिंगाष्टकम् स्तोत्र (Lingastakam Stotra)

1. ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्,
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

2. देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम्,
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

3. सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्,
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

4. कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्,
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

5. कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्,
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

6. देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्,
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

7. अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्,
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.

8. सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्,
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्.
लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते

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