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तीन अवतारों में आए थे रावण और कुंभकरण, क्या आप जानते हैं इनसे जुड़ा ये खास रहस्य?

तीन अवतारों में आए थे रावण और कुंभकरण, क्या आप जानते हैं इनसे जुड़ा ये खास रहस्य?

रावण या कुंभकरण दो ऐसे नाम जो दुनिया में केवल एक बार ही सामने आए और फिर कभी किसी ने अपने बच्चों के ये नाम नहीं रखे। वहीं इनके पृथ्वी पर तीन बार आने पर भी इनके उन अवतारों में रखे गए नाम भी एकाएक कोई नहीं रखता। इन दोनों ने हर बार अपने अवतार में राक्षस मूल को चुना।

दरअसल राजाधिराज लंकाधिपति महाराज रावण को 'दशानन' के नाम से भी जाना जाता है। रावण को लंका का एक तमिल राजा कहा जाता है। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का जानकार होने के साथ ही ब्रह्मज्ञानी व कई तरह की विद्याओं का भी जानकार था।

इन्द्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानने के कारण ही रावण को 'मायावी' भी कहा जाता था। उसके पास पुष्पक नामक एक ऐसा विमान भी था, जो किसी दूसरे के पास नहीं था। ये ही वे मुख्य कारण थे जिसके चलते सभी उससे डरते थे।

कौन था रावण? हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार रावण व कुंभकरण अपने जन्म से पूर्व में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सनक, सनंदन आदि ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन के लिए विष्णुलोक पहुंचे, परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोककर अंदर जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि अभी भगवान अभी विश्राम कर रहे हैं।

जय व विजय की इस घ्रष्टता पर ऋषियों ने क्रोध में आकर उन दोनों को शाप देते हुए कहा कि 'जाओ तुम राक्षस बन जाओ।' इसके बाद जय और विजय ने अपने अपराध के लिए ऋषियों से क्षमा मांगी। साथ ही भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से इन्हें क्षमा करने को कहा।

इस पर ऋषियों ने कहा कि हमारा शाप खाली नहीं जा सकता। हां, इसमें यह परिवर्तन हो सकता है कि तुम हमेशा के लिए राक्षस नहीं रहोगे, लेकिन कम से कम 3 जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना ही होगा और उसके बाद तुम पुन: इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे।

परंतु इसके साथ एक और शर्त यह है कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी-स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा। वहीं इस दौरान ऋषियों ने यह भी कहा यदि तुम अपने इन जन्मों के दौरान भी भगवान विष्णु भक्त बने रहे, तो तुम्हें पांच जन्म लेने होंगे, वहीं यदि तुम इन जन्मों के दौरान विष्णु विरोधी बने तो तुम तीन जन्मों के बाद ही अपना स्थान वापस पा सकोगे।

ऋषियों के इसी शाप के चलते भगवान विष्णु के इन द्वारपालों (जय-विजय) ने सतयुग में अपने पहले जन्म में हिरण्याक्ष (विजय) व हिरण्यकशिपु (जय) राक्षसों के रूप में जन्म लिया। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था। जो पृथ्वी को लेकर जल में चला गया था।

ऐसे में पृथ्वी को जल से बाहर निकालने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार लेना पड़ा। इस अवतार में उन्होंने धरती पर से जल को हटाने के लिए काफी कार्य करना पड़ा। उनके इस कार्य में हिरण्याक्ष बार-बार विघ्न डालता था, अत: अंत में श्रीविष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को बाहर निकाला और उसके बाद धरती को पुन: मनुष्यों के रहने लायक स्थान बनाया।

वहीं हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने तप करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था। वरदान में उसने जो मांगा उसके अनुसार उसे न कोई आकाश में मार सकता है और न धरती में और न ही पाताल में। न दिन में और न रात में। न कोई देव, न राक्षस और न मनुष्य मार सकता है तो फिर चिंता किस बात की? यही सब विचार करने के बाद उसने खुद को ईश्वर घोषित कर दिया था।

भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करने के कारण वह भगवान विष्णु विरोधी हो गया, लेकिन जब उसे पता चला कि उसका पुत्र प्रहलाद विष्णुभक्त है। तो उसने उसे मरवाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन वह अपने पुत्र को मार नहीं सका। जबकि अंत में उसने एक खंभे में तलवार मारकर प्रहलाद से पूछा- 'यदि तेरा भगवान सभी जगह है तो क्या इस खंभे में भी है?'

खंभे में तलवार मारते ही खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह रूप में प्रकट हुए, जो न देव थे और न राक्षस और न मनुष्य। और उस समय न रात थी न दिन यानि शाम का समय था। इस नृसिंह अवतार में भगवान विष्णु अर्धमानव और अर्धपशु थे। और उन्होंने संध्याकाल में हिरण्यकशिपु को अपनी जंघा पर बिठाकर (यानि न धरती पर न आकाश में) उसका वध कर दिया।

वध होने के बाद ये ही दोनों भाई त्रेतायुग में रावण(जय) और कुंभकर्ण (विजय) के रूप में पैदा हुए और फिर श्रीविष्णु अवतार भगवान श्रीराम के हाथों मारे गए। अंत में वे तीसरे जन्म में द्वापर युग में दंतवक्त्र (वहीं कुछ लोग इसे कंस बताते हैं(जय)) व शिशुपाल(विजय) नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए। इन दोनों का भी वध भी भगवान श्रीविष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।

रावण के कुछ खास गुण : रावण के बारे में वाल्मीकि रामायण के अलावा श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण,पद्मपुराण सहित कई ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है। भगवान रामचंद्र का विरोधी और शत्रु होने के बावजूद रावण 'सिर्फ बुरा' ही नहीं था। उसमें कई विशेष गुण भी थे।

दरअसल रावण बहुत बड़ा शिवभक्त था, जिसने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के साथ ही अन्य कई तंत्र ग्रंथों की भी रचना की थी। माना जाता है कि लाल किताब (ज्योतिष का प्राचीन ग्रंथ) भी रावण संहिता का अंश है।

इसके साथ ही रावण एक महापंडित भी था, जो समस्त वेदों, शास्त्रों व पुराणों का जानकार था। रावण ने ही शिव की स्तुति में तांडव स्तोत्र के अलावा अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।

जब रावण मृत्युशैया पर पड़ा था, तब राम के कहने पर उसके पास आए लक्ष्मण को रावण ने राजनीति के कई गूढ़ रहस्य बताए थे। रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं, वैज्ञानिक भी था। आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान महत्वपूर्ण है।

रावण ने असंगठित राक्षस समाज को एकत्रित कर उनके कल्याण के लिए कई कार्य किए थे। रावण के शासनकाल में जनता सुखी और समृद्ध थी।

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