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बच्चों को भूल से भी ना कहें ये पांच बातें, उनके मनोबल पर डालती हैं बुरा प्रभाव

बच्चों को भूल से भी ना कहें ये पांच बातें, उनके मनोबल पर डालती हैं बुरा प्रभाव

छोटे बच्चे कुम्भार के उस घड़े की तरह होते हैं, जिसे चाहे मर्जी वैसे ढाल लो। लेकिन कभी ऐसा नहीं हो सकता है कि बच्चे रूपी उस घड़े को हम बिना आकार दिए ही छोड़ दें। जिस तरह कुम्भार मिट्टी के घड़े को यदि आकार ना दे, तो मिट्टी किसी काम नहीं रहती। सिवाय बारिश, आंधी तूफान में लोगों की परेशानी बढ़ाने के। ठीक इसी तरह बच्चे भी होते हैं। यदि हम बच्चों को बचपन से ही कोई सही सीख और रास्ता ना दिखाएँ तो स्वयं वह समाज की ग़लत बातों और माहौल में ढलते चले जाते हैं। इसका नतीजा हमें तब दिखाई देता है जब वह बड़े हो जाते हैं। उनमें संस्कारों और गुणों की कमी दिखाई पड़ती है। समाज में फैली कुरीतियाँ उनके जीवन का अंग बन जाती हैं।

लेकिन जो माता-पिता अपने बच्चों के प्रति बचपन से ही सजग होते हैं, उनके बच्चे बड़े होकर हमेशा संस्कार और गुणों से भरपूर होते हैं। वह इस समाज पर बोझ नहीं, बाल्कि समाज के मार्गदर्शक के रूप में होते हैं। आज हम आपको पांच ऐसी बाते बताने जा रहे हैं जो आपको कभी भी अपने बच्चों के सामने नहीं कहनी चाहिए। भले ही उन्होंने कोई गलती क्यों ना कर दी हो, या आप किसी गुस्से में ही क्यों ना हों। गुस्सा या गलती तो क्षणिक भर होती है। इसमें सुधार किया जा सकता है। लेकिन आपकी कही इन पांच बातों से आपके बच्चों के मनोबल पर जो बुरा प्रभाव पड़ेगा उसमें सुधार करना संभव नहीं है। आइए जानते हैं कौन-सी हैं वह पांच बातें जो आपको बच्चों के सामने कभी नहीं करनी…

1- घर से निकल जा कई बार माता-पिता जब बहुत गुस्से में होते हैं। या बच्चे उनका कहना नहीं मानते तो उन्हें कह देते हैं कि ‘तू मेरे घर से बाहर निकल जा’ या ‘तू इस घर पर कभी मत आइयो’ ये शब्द किसी के भी मन को भी ठेस पहुँचा सकते हैं। संभव है कि इसको सुनकर छोटी उम्र में बच्चे आस-पड़ोस में कहीं जाकर बैठ जाएँ और कुछ घंटों बाद वह फिर से घर वापिस आ जाएँ और माहौल शांत हो जाए। लेकिन वह घर वापिस तभी तक आते हैं जब तक वह सक्षम ना हों या चीजों को भूल जाते हो।

लेकिन यदि यही बातें किसी बड़ी उम्र के बच्चे को कह दी जाएँ जो कि पूरी तरह समझदार हो तो उसके मन को बहुत बड़ा धक्का लगेगा। सुबह कहीं गई बातें वह बच्चा शाम तक भूलने वाला नहीं है। कई बार तो बड़े बच्चे ऐसी बातें सुनकर आत्महत्या या हमेशा-हमेशा के लिए घर छोड़कर जाने तक का मन बना लेते हैं। जो कि बाद में परिवार के लिए बेहद घातक साबित होता है। इसलिए जब भी बच्चे से गलती हो जाए या गुस्सा आ जाए तो उस बच्चे के मन में ये बात कभी ना डालें कि वह इस घर के काबिल ही नहीं है। उसे प्यार से समझाएँ। ताकि उसे गलती का अहसास भी हो जाए और उस पर ग़लत प्रभाव भो ना पडे।

2- काश! तुम पैदा होते ही मर गए होते कई बार जब बच्चा लगातार कई गलतियाँ कर देता है या कोई बड़ा नुक़सान कर देता है। तो हम उसे देखकर हम आग बबूला हो जाते हैं और कहते हैं ‘तू पैदा होते ही क्यों नहीं मर गया’ या ‘तू इस धरती पर बोझ आ गया है’ ऐसी बातें बच्चा क्या किसी के भी मन के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा सकती है। बच्चे ऐसी बातें सुनने के बाद अपने आपको बेहद लज्जित महसूस करने लगते हैं। वह सोचते हैं कि दुनिया में मैं किसी काम का नहीं हूँ। इससे बेहतर हो कि क्यों ना मैं मर ही जाऊँ।

कई बार बच्चे लगातार ऐसी घटनाओं से बेहद आहत हो जाते हैं और उनके मन-मास्तिष्क में बुरे विचार आने लगते हैं। इन बातों को सुनने के बाद बच्चा अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण भाव भी खो देता है। इसलिए कभी भी हंसी-मजाक के दौरान भी ऐसी बात ना कहें। कहते भी हैं शरीर के घाव भर जाते हैं, पर बातों के घाव कभी नहीं भरते। ये बातें भी उसी घाव को देने का काम करती हैं।

3- तुमसे अच्छा तो वह है कई बार हम बोर्ड के नतीजों या कोई और बात हो तो हम अपने बच्चों की तुलना दूसरों से करने में लग जाते हैं। ऐसी तुलना बेहद घा/तक सिद्ध हो सकती है। ऐसा ज्यादातर तब देखा जाता है जब बोर्ड के नतीजे का समय हो फिर एक ही काम को आपका बच्चा ना कर पाए और दूसरा बच्चा कर जाए। तो हम कहते हैं कि तुमसे अच्छा तो तुम्हारा भाई है, या वह पडोसी का लड़का है। मज़ाक में तो ये बात कुछ हद तक चल जाएगी। लेकिन जब बात किसी गंभीर बात की आ जाए तो ज़रूरत हौसले की होती है। क्योंकि बच्चे उस समय ख़ुद भी शर्मिदा महसूस कर रहे होते हैं कि मैं नहीं कर पाया और वह कर गया।

ऐसी परिस्थिति में मां-बाप को चाहिए कि उसका हौसला बढ़ाएँ। ना कि उसकी तुलना कर उसका अपमान करें। कभी भी कोई दो आदमी एक जैसे नहीं हो सकते हैं। सचिन तेंदुलकर जैसे लोग दसवीं फेल होकर भी दुनिया में नाम कमा रहे हैं। एपीजे अब्दुल कलाम अख़बार बेचने के बाद भी देश के रास्ट्रपति बने थे। ऐसे में हम कभी भी दो लोगों की तुलना कर समझदारी नहीं दिखाते। बाल्कि ज़रूरत इस बात की है कि आपका बच्चा किस क्षेत्र में बेहतर कर सकता है वह बताएँ और देखें। उससे गलती हुई क्यों उसका समाधान बताएँ। ना कि उस पर नाकाबिल होने का ठप्पा लगाएँ।

4- तुम्हारी उम्र में तो मैंने ये कर डाला था आप हो सकता है अपने बच्चे से बेहतर हो। आपमें उससे बेहतर हुनर हो। लेकिन समय, परिस्थितियाँ हमेशा सब एक जैसी नहीं होती। यदि आप डाॅक्टर बने हो तो ज़रूरी नहीं आपका बच्चा भी डाॅक्टर बनना पंसद करें। उसकी इच्छा और रूचि अलग हो सकती है। इसलिए बेहतर यही होगा कि आपने जो काम किया आप उसकी तुलना अपने बच्चे से ना करें। ये बच्चे के मनोबल पर तो बुरा प्रभाव डालेगा ही, साथ ही वह ख़ुद को कमजोर भी महसूस करने लगेगा। ऐसे में संभव है कि वह अपने लक्ष्य को बदलकर कोई दूसरा लक्ष्य चुन ले। जबकि कहते हैं कि सफलता लक्ष्य बदलने से नहीं, निरंतर अभ्यास से मिलती है। इसलिए कभी भी अपनी तुलना अपने बच्चे से ना करें। इससे कोई फायदा नहीं होने वाला।

5- तुम हमेशा धीरे काम करते हो कई बार हम बच्चों को अपना काम सौप देते हैं और कहते हैं कि तुम हमेशा धीरे काम करते हो। या काम से जी चुराते हो। उदाहरण के तौर पर मान लीजिए यदि आप हर रोज़ सब्जी काटते हैं और एक दिन अपने बच्चे को सब्जी काटने को कह दिया तो समय ज़्यादा लगना स्वभाविक है। ऐसे में उसे ये कहना कि तुम बहुत धीरे हाथ चलाते हो। ये कोई अच्छी बात नहीं होगी। आप उसी काम में माहिर है तो काम जल्दी होगा ही। पर इस बात को कहकर अपने बच्चों को अपमानित ना करें। हमेशा बच्चों पर चिल्लाने की बजाय आप इसी बात को सही तरीके से भी कह सकते हैं। कि देखते हैं आज कौन पहले काम करता है। या जो पहले काम करेगा उसे इनाम मिलेगा।

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