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Sankashti Chaturthi: साल का आखिरी संकष्टी चतुर्थी व्रत आज, इस कथा के बिना अधूरी है पूजा, व्रत के दौरान न करें ये भूल

आज साल 2021 की अंतिम संकष्टी चतुर्थी का व्रत है। इस दिन सभी देवी-देवतों में प्रथम पूजनीय गणेश जी की पूजा की जाती है। पौष मास की चतुर्थी को विशेष महत्व होता है।
श्री गणेश को प्रसन्न करने वाला संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत इंद्र योग में रखा जाएगा। इस दिन चंद्रमा का पूजन करने और श्री गणेश के विशेष पूजन-अर्चन से वरदान प्राप्त होता है। जो भी भक्त भगवान गणेश की सच्चे मन से पूजा करता है। विघ्नहर्ता उसके सभी कष्ट हर लेते है। इस दिन लड्डू और मोदक का भोग लगाने का रिवाज है। चंद्रदर्शन करके चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात व्रत पूर्ण होता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत का शुभ मुहूर्त

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार, पौष कृष्ण चतुर्थी 22 दिसंबर दिन बुधवार को शाम 04:52 बजे से लगेगी।

इस तिथि का समापन 23 दिंसबर गुरुवार को शाम 06:27 बजे होगा।

चतुर्थी तिथि में चंद्रोदय 22 दिसंबर को होगा, इसलिए संकष्टी चतुर्थी का व्रत 22 दिसंबर को रखा जाएगा।

इंद्र योग दोपहर 12:04 बजे तक है।

संकष्टी चतुर्थी का चंद्रोदय समय

आज चंद्रमा रात 08:12 बजे उदय होगा। इस दिन चंद्रमा के दर्शन के बाद ही व्रत पारण किया जाता है। चंद्रमा को जल अर्पित करने के बाद ही पारण किया जाता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत एवं पूजा विधि

संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रात: स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पित करें। उसके बाद रात संकष्टी चतुर्थी व्रत, गणेश पूजा का संकल्प लें।

पूजा स्थान पर आप गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें। अब गंगाजल से अभिषेक करें, चंदन लगाएं।

गणेश जी को वस्त्र, फूल, माला, 21 दूर्वा, फल, अक्षत्, धूप, दीप, गंध, मोदका का भोग अर्पित करें।

गणेश चालीसा का पाठ करें, उसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें।

पूजा के अंत में गणेश जी की आरती करें। फिर दिनभर फलाहार करते हुए भगवत भजन करें।

रात के समय चंद्रमा को जल अर्पित करें और पूजा करें। उसके बाद पारण करें। यदि आप उसी दिन पारण नहीं करते हैं, तो अगले दिन कर लें।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

एक समय की बात है। भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे। तभी पार्वती जी ने चौपड़ खेलने की बात कही। शिव जी तैयार हो गए, पर हार जीत का निर्णय कौन करता, इसलिए भगवान शिव ने एक पुतले का बालक बनाकर, उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी। फिर उससे खेल का निर्णायक बना दिया। खेल शुरु हुआ। तीन बार खेल हुआ, तीनों बार ही माता पार्वती विजयी हुईं। जब निर्णायक से विजेता के बारे में पूछा गया, तो उस बालक ने भगवान शिव को ही विजयी घोषित कर ​दिया। इससे क्रोधित माता पार्वती ने उसे लंगड़ा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। तब उस बालक को गलती का एहसास हुआ और उसने क्षमा मांगते हुए श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा।

माता पार्वती ने उससे नाग कन्याओं से गणेश व्रत के बारे में पूछने को कहा। काफी समय बाद उस स्थान पर जब नाग कन्याएं आईं, तो उस बालक ने उनसे गणेश व्रत के बारे में पूछा। उनसे व्रत विधि पता करके उस बालक ने 21 गणेश व्रत किए। गणेश जी प्रसन्न हुए तो उसने पैर ठीक होने और अपने माता पिता के पास वापस जाने का वरदान मांगा। गणेश जी ने मनोकामना पूरी कर दी। वह बालक कैलाश गया और भगवान शिव से पूरी बात बताई। भगवान शिव ने भी 21 दिनों तक गणेश व्रत किया, जिससे माता पार्वती खुश हुईं और खेल के दौरान की नाराजगी दूर हो गईं। शिव जी से गणेश व्रत विधि जानकर उन्होंने भी गणेश व्रत किया। इसके परिणाम स्वरूप उनसे मिलने कार्तिकेय जी आए। इस प्रकार से गणेश व्रत को सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला बताया गया है।

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