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शीतलाष्टमी 2022 : जानें, आखिर क्यों इस गांव में नहीं जलते चूल्हे, वजह जानकर रह जाएंगे दंग

जानें, आखिर क्यों इस गांव में नहीं जलते चूल्हे, वजह जानकर रह जाएंगे दंग

चाकसू कस्बे के शील की डूंगरी स्थित शीतला माता मंदिर में होली से ठीक 8 दिन बाद शीतलाष्टमी यानी बास्योड़ा के मौके पर 24- 25 मार्च को दो दिवसीय लक्खी मेला भरेगा। कोरोना काल के दौरान पिछले दो साल से खोई हुई मेले की रौनक इस साल दोगुनी नजर आने की संभावना है। माता के मंदिर में श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा। गौरतलब है कि 500 वर्ष पुराना माता का मंदिर एक पहाड़ी पर दूर से नजर आ जाता है। करीब 300 मीटर की ऊंचाई पर बने इस मंदिर में सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर भक्त मां के दर्शन करते हैं और उन्हें शीतल खाने का भोग लगाते हैं। मंदिर समिति महामंत्री लक्ष्मण प्रजापति ने बताया कि मंदिर समिति एवं प्रशासन मेले की विभिन्न चाक-चौबंद व्यवस्थाओं के लिए जुट गया है। इस दिन कस्बे समेत आस-पास के कई गांवों में चूल्हे नहीं जलते हैं। घरों में एक दिन पूर्व शाम को ही खाना बना लिया जाता है।

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लुप्त होती जा रहीं परंपराएं

आधुनिकता की दौड़ में मेलों की पुरानी परंपराएं लुप्त होती जा रही हैं। पहले लगने वाले मेलों में विभिन्न खेलों का आयोजन हुआ करता था जिसमें जीतने वाले को इनाम भी दिया जाता था। ऐसे में लोगों को मेलों का इंतजार रहता था। दिन में ग्रामीण मेला स्थल पर समय व्यतीत करते, वहीं रात में गांव, मोहल्लों में लोक गीत के साथ उत्सव में ग्रामीण झूमते मिलते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि आज भी शीतला माता के मेले पर लोग अपने रिश्तेदारों को भी आमंत्रित करते हैं। वहीं मेले के बाद चाकसू कस्बे में लगने वाला दो दिवसीय गुदड़ी का मेला भी अपनी पहचान खोता जा रहा है। इस मेले में एक दिन महिलाएं बच्चों के साथ जाती थीं और एक दिन पुरुष अपने साथियों के साथ जाते थे, लेकिन अब ये मेला एक ही दिन का लगता है।

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