श्री कृष्ण की इन बातो को मानने वाला कभी नही रहेगा दुखी
हिन्दू धर्म में गीता ग्रन्थ का विशेष महत्व है। गीता नामक ग्रन्थ का जन्म उस समय हुआ था जब भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को धर्म उपदेश दिया था। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया था कि सुख और दुख के समय मनुष्य को क्या करना चाहिए। सुख और दुख जीवन की ऐसी स्थिति है जिनमें हमें कुछ खास बातों का हमेशा ख्याल रखना चाहिए।
सुख और दुख के समय अक्सर मनुष्य का मन काबू में नहीं रहता जिसकी वजह से उसे कई बार भारी नुकसान भी उठाना पड़ जाता है। इसलिए यह दोनों स्थितियां ही ऐसी है जिसमें मनुष्य को समझदारी से काम लेना चाहिए।
महाभारत के भीष्म पर्व का श्लोक
न प्रह्दष्येत प्रियं प्राप्त नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।।
पहली स्थिति सुख की इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब मनुष्य बहुत ज्यादा खुश होता है तो वह अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पाता और वह मन का गुलाम बन जाता है। खुशी के समय में मनुष्य अक्सर ऐसे वादे कर देता है जो भविष्य में पूरा कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है जिसकी वजह से कई बार बुरे परिणाम भी सामने आते है। चूंकि सुख के दिन ज्यादा समय तक नहीं रहते इसलिए इन दिनों मनुष्य को अपने मन को वश में रखना चाहिए और कोई भी वादा या बात सोच समझ कर ही करें।
दूसरी स्थिति दुख की बुरा समय आने पर कई लोग अपना धैर्य खो देते है और अपनी छोटी-छोटी ख्वाहिशें पूरी करने के लिए ऐसे कदम उठा लेते है जो उन्हें बहुत ही महंगे पड़ते है। दुख की स्थिति ऐसा समय होता है जब मनुष्य आसानी से अपने मार्ग से भटक कर गलत मार्ग पर जा सकता है। मनुष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि दुख के दिन भी हमेशा नहीं रहते इसलिए दुख के दिनों में कोई भी गलत कार्य न करें और पूरी समझदारी से काम को अंजाम दे। अपने मन को सूझ बूझ के साथ काम में लेना चाहिए और दुख व परेशानियों का डट का सामना करना चाहिए।

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