15 साल पुराना वो छक्का, गावस्कर ने कहा- मरते समय यादों में रखना चाहूंगा
भारत के लिए ये सिर्फ एक फाइनल नहीं था, बल्कि 28 साल के लंबे इंतजार को खत्म करने का सबसे बड़ा मौका था.
कपिल देव की कप्तानी में 1983 में पहली बार वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय टीम कई बार इस ट्रॉफी के करीब पहुंची, लेकिन हर बार निराशा हाथ लगी. 2003 में भी भारत फाइनल तक पहुंचा, मगर खिताब हाथ नहीं लगा. ऐसे में 2011 का फाइनल एक और परीक्षा था. श्रीलंका ने पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत के सामने 275 रनों का लक्ष्य रखा.
जवाब में टीम इंडिया की शुरुआत ऐसी हुई कि स्टेडियम में बैठे फैंस की धड़कनें बढ़ गईं. कुछ ही देर में भारत के दो बड़े स्टार क्रिकेटर पवेलियन लौट चुके थे. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इस फाइनल को क्रिकेट इतिहास के सबसे यादगार मुकाबलों में शामिल कर दिया.
भारत के खिलाफ श्रीलंका ने खड़ा किया चुनौतीपूर्ण स्कोर
श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया. भारत के लिए जहीर खान ने दमदार शुरुआत की और अपने पहले स्पेल में तीन मेडन ओवर डालते हुए उपुल थरंगा का विकेट गिराया. उन्होंने अपने शुरुआती स्पेल में 5 ओवर में सिर्फ 3 रन दिए और एक विकेट लिया. इसके बाद महेला जयवर्धने ने 88 गेंदों पर नाबाद 103 रन की शानदार पारी खेली और श्रीलंकाई पारी को संभाला. जयवर्धने की इस पारी की बदौलत श्रीलंका ने 50 ओवर में 6 विकेट खोकर 274 रन बनाए.
पहले ओवर में भारत की उम्मीदों को लगा झटका
भारत की पारी शुरू हुई तो लसिथ मलिंगा ने दूसरे ही गेंद पर वीरेंद्र सहवाग को एलबीडब्ल्यू आउट कर दिया. भारत का स्कोर अभी संभला भी नहीं था कि सचिन तेंदुलकर भी 18 रन बनाकर आउट हो गए. दो विकेट गिरते ही मैदान में सन्नाटा पसर गया था. तभी क्रीज पर गौतम गंभीर के साथ विराट कोहली ने उम्मीदों को जगाया. दोनों ने पारी को संभालने की कोशिश की और भारत को शुरुआती झटकों से बाहर निकाला. कोहली ने 35 रन बनाए, लेकिन उनके आउट होने के बाद फिर सवाल खड़ा हो गया कि भारत को जीत की मंजिल तक कौन पहुंचाएगा.
गंभीर ने खेली 97 रनों की शानदार पारी
गंभीर ने पारी संभाली और एक छोर पर डटे रहे. उन्होंने 97 रनों की शानदार पारी खेली. गंभीर शतक से सिर्फ 3 रन दूर रह गए, लेकिन उनकी इस पारी ने भारत की जीत की नींव रख दी. उन्होंने पहले विराट कोहली और फिर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ महत्वपूर्ण साझेदारियां कीं. गंभीर और धोनी के बीच 101 रनों की साझेदारी ने मुकाबले का रुख भारत की ओर मोड़ दिया.
भारत लक्ष्य के करीब पहुंचता जा रहा था. गंभीर 97 रन बनाकर आउट हुए, लेकिन तब तक टीम इंडिया जीत की दहलीज पर पहुंच चुकी थी. धोनी ने अपनी पारी जारी रखी. उन्होंने 79 गेंदों पर नाबाद 91 रन बनाए. श्रीलंका की कोशिश थी कि किसी तरह मुकाबले को आखिरी ओवरों तक खींचा जाए. लेकिन भारतीय कप्तान के इरादे कुछ और थे. अब भारत को विश्व कप जीतने के लिए बस कुछ ही रन चाहिए थे.
एमएस धोनी का वो छक्का, जो इतिहास बन गया, नुवान कुलसेकरा गेंदबाजी कर रहे थे. भारत जीत से सिर्फ 4 रन दूर था. कुलसेकरा ने गेंद डाली और धोनी ने उसे लॉन्ग ऑन के ऊपर से बेहद ताकतवर अंदाज में स्टैंड में पहुंचा दिया. गेंद जैसे ही दर्शकों के बीच पहुंची, भारत विश्व कप चैंपियन बन चुका था. इसके साथ ही भारत ने 28 साल बाद वनडे विश्व कप की ट्रॉफी अपने नाम कर ली. धोनी का बल्ला ऊपर उठा और पूरा वानखेड़े जश्न में डूब गया. रवि शास्त्री की वो मशहूर कमेंट्री आज भी इस पल की याद दिलाती है. धोनी ने मैच खत्म किया और भारत ने 28 साल बाद विश्व कप जीत लिया.
गावस्कर ने कहा- मरते समय यादों में रखना चाहूंगा
दुनिया के महान बल्लेबाज में से एक सुनील गावस्कर ने एक इंटरव्यू के दौरान अपनी एक ख्वाहिश जाहिर करते हुए कहा था कि, मरने से पहले वो 1983 का विश्व कप ट्रॉफी मोमेंट और धोनी के द्वारा 2011 विश्वकप फाइनल में लगाए गए छक्के को देखना पसंद करेंगे. अपनी बात रखते हुए गावस्कर ने कहा कि, 'यह मेरे लिए इमोशनल पल है, इस बंदे ने (धोनी) ने क्या-क्या नहीं किया है और मुझे पता है कि अब मेरी लाइफ का यह आखिरी दौर चल रहा है, यह मेरे जिन्दगी के आखिरी लम्हें चल रहे हैं तो मुझे 2 मिनट के लिए 2 लम्हों को फिर से जीना है, एक तो जब 1983 में वो कप कपिल देव उठाते हैं और दूसरा जब धोनी वह छक्का मारते हैं और उसके बाद जिस तरह से बल्ले को घुमाते हैं, उन पलों को मैं मरने से पहले देखना चाहता हूं.'
No comments